हरियाणा के गुरुग्राम में रहने वाले एक दंपती ने दिल्ली के एक आईवीएफ सेंटर पर गंभीर आरोप लगाए हैं। दंपती का दावा है कि आईवीएफ प्रक्रिया के जरिए जन्मीं उनकी जुड़वां बेटियों का डीएनए न तो मां से मेल खाता है और न ही पिता से। इस खुलासे के बाद परिवार सदमे में है और पिछले कई महीनों से न्याय की गुहार लगा रहा है।
गुरुग्राम के सेक्टर-111 स्थित पुरी डिप्लोमेटिक ग्रीन्स सोसाइटी में रहने वाले राहुल राठौर और उनकी पत्नी मीनू राठौर के अनुसार उन्होंने दिसंबर 2024 में दिल्ली के ग्रेटर कैलाश स्थित एक आईवीएफ सेंटर में इलाज शुरू कराया था। दंपती का कहना है कि उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि पूरी प्रक्रिया में केवल उनके ही स्पर्म और एग्स का इस्तेमाल किया जाएगा।
जनवरी 2026 में द्वारका के एक निजी अस्पताल में मीनू ने जुड़वां बेटियों को जन्म दिया। बच्चों के जन्म के बाद परिवार में खुशी का माहौल था, लेकिन समय के साथ कुछ परिजनों ने बच्चियों की शक्ल-सूरत परिवार के किसी सदस्य से मेल न खाने की बात कही। इसके बाद दंपती ने दो अलग-अलग अधिकृत लैब में डीएनए टेस्ट कराया।
DNA रिपोर्ट ने उड़ा दिए होश
राहुल राठौर के मुताबिक, दोनों लैब की रिपोर्ट में सामने आया कि बच्चियों का जैविक मेल न तो उनकी मां से हो रहा है और न ही पिता से। रिपोर्ट देखने के बाद परिवार स्तब्ध रह गया।
दंपती का आरोप है कि जब उन्होंने इस बारे में संबंधित आईवीएफ सेंटर और अस्पताल से संपर्क किया तो उनकी शिकायत पर गंभीरता से ध्यान देने के बजाय उन पर ही सवाल उठाए गए।
कोर्ट के आदेश पर दर्ज हुआ केस
पीड़ित परिवार का कहना है कि उन्होंने स्वास्थ्य मंत्रालय, प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रीय महिला आयोग और पुलिस से भी शिकायत की, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने साकेत कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
कोर्ट के निर्देश पर ग्रेटर कैलाश थाना पुलिस ने एआरटी (Assisted Reproductive Technology) अधिनियम 2021 और धोखाधड़ी से संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया। हालांकि दंपती का आरोप है कि एफआईआर दर्ज होने के दो महीने बाद भी जांच में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है।
दंपती ने उठाई वैज्ञानिक जांच की मांग
राहुल और मीनू राठौर ने मामले की निष्पक्ष जांच के लिए आईवीएफ सेंटर के सीसीटीवी फुटेज, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, सर्वर लॉग और एम्ब्रियो ट्रांसफर से जुड़े दस्तावेजों की फॉरेंसिक जांच कराने की मांग की है।
उनका कहना है कि एम्ब्रियो लॉग की जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि किस मरीज का भ्रूण किस प्रक्रिया में इस्तेमाल किया गया। दंपती का मानना है कि तकनीकी और वैज्ञानिक जांच ही इस पूरे मामले की सच्चाई सामने ला सकती है।
सोशल मीडिया के जरिए लगाई मदद की गुहार
पिछले पांच महीनों से न्याय की तलाश में भटक रहे राहुल राठौर ने अपनी पत्नी और दोनों बच्चियों के साथ एक वीडियो सोशल मीडिया पर भी साझा किया है। वीडियो में उन्होंने लोगों से मदद की अपील की है।
दंपती ने उन परिवारों से भी संपर्क करने की अपील की है, जिन्होंने वर्ष 2025 में संबंधित आईवीएफ सेंटर में इलाज कराया था या जिनके बच्चों का जन्म 5 जनवरी 2026 के आसपास हुआ था। उनका कहना है कि संभव है किसी स्तर पर भ्रूण या बच्चे की अदला-बदली हुई हो।
हालांकि दंपती ने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य किसी परिवार को परेशान करना नहीं है। वे सिर्फ सच्चाई सामने आने और अपने जैविक बच्चों तक पहुंचने की उम्मीद कर रहे हैं।
फिलहाल इस मामले ने आईवीएफ प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सभी की नजर पुलिस जांच और वैज्ञानिक रिपोर्टों पर टिकी हुई है।
