भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रव्यापी अभियान “लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ” के अंतर्गत आज आयोजित पत्रकार वार्ता में पार्टी प्रवक्ता ने कांग्रेस और विपक्षी दलों पर देश की संवैधानिक संस्थाओं को योजनाबद्ध तरीके से बदनाम करने और मतदाताओं के बीच भ्रम फैलाने का गंभीर आरोप लगाया।
पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए भाजपा नेता ने कहा:
“अराजकता के माध्यम से देश की संस्थाओं की क्रेडिबिलिटी कम करना और उनकी साख पर सवाल खड़ा करना कांग्रेस पार्टी और विपक्षी गठबंधन का मुख्य एजेंडा बन चुका है। आज देश के सामने स्पष्ट विभाजन है—एक तरफ बाबा साहब के संविधान पर चलने वाला ‘लोकतंत्र’ है और दूसरी तरफ विपक्ष का ‘अराजकता-तंत्र’। लोकतंत्र नियम, कानून और सिस्टम से चलता है, न कि सड़क पर हंगामे से।”
संवैधानिक संस्थाओं और चुनाव आयोग पर विपक्ष के दोहरे मानदंड
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग पर उठाए जा रहे सवालों का जवाब देते हुए नेता ने कहा कि यदि विपक्ष को किसी संवैधानिक पद, चुनाव आयोग या न्यायपालिका से कोई आपत्ति है, तो भारत के संविधान में महाभियोग (Impeachment) और विधिसम्मत व्यवस्थाएं मौजूद हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह 3 लाख वोटों से चुने गए मेयर को हटाने के लिए दो-तिहाई पार्षदों का संवैधानिक प्रस्ताव आवश्यक होता है—3 हजार लोग धरने पर बैठकर इस्तीफा नहीं करवा सकते—उसी तरह संवैधानिक संस्थाएं भी भीड़ के दबाव में नहीं, बल्कि नियम-कायदों से काम करती हैं।
उन्होंने राहुल गांधी और प्रशांत भूषण के बयानों को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि भारत का लोकतंत्र अत्यंत परिपक्व है। देश ने 1975 के आपातकाल जैसा काला दौर देखा है जब लोकतंत्र को कुचल दिया गया था, लेकिन उस समय भी विपक्षी नेताओं ने न्यायपालिका या चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर इस तरह अनर्गल हमले नहीं किए थे।
SIR से सरकार बनती तो विपक्ष कैसे जीतता?
मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) और EVM पर विपक्ष के आरोपों की हवा निकालते हुए भाजपा नेता ने सीधा सवाल किया:
“यदि SIR या EVM में कोई गड़बड़ी होती, तो केरल और तमिलनाडु में विपक्षी दल, जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और तेलंगाना, कर्नाटक तथा हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकारें कैसे बनतीं? कई नगर परिषद चुनाव तो मतपत्र (बैलेट पेपर) पर हुए, वहां भी जनता ने भाजपा को चुना।”
SIR में 13 करोड़ वोटों का आधिकारिक ब्यौरा
विपक्ष द्वारा 13 करोड़ वोटों को लेकर फैलाई जा रही अफवाहों का खंडन करते हुए भाजपा ने इसका विस्तृत गणित प्रस्तुत किया:
6.3 करोड़ वोट (दोहरे/स्थानांतरित मतदाता): ये ऐसे मतदाता थे जिनके नाम दो या तीन स्थानों पर दर्ज थे। फोन नंबर और आधार लिकिंग जैसी तकनीकी व्यवस्थाओं के चलते यह डुप्लीकेसी पकड़ी गई। उदाहरण के तौर पर हरियाणा में 13 लाख और पंजाब में 9.5 लाख वोट इसलिए कम हुए क्योंकि प्रवासी श्रमिकों ने अपने मूल राज्यों में नाम बनाए रखे। इसके अलावा लाडली बहना जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए कई महिलाओं ने अपने नाम मूल गृह राज्य में स्थानांतरित किए हैं।
1 करोड़ वोट (एक ही सूची में दोहराव): देश भर के करीब 10 लाख मतदान केंद्रों पर मुद्रण या लिपिकीय त्रुटियों के कारण एक ही बूथ सूची में 8-10 नाम दोहरे दर्ज थे, जिन्हें दुरुस्त किया गया।
2.8 करोड़ वोट (मृतक मतदाता): ये ऐसे मतदाता हैं जिनका निधन हो चुका है। वर्ष 2012 में जारी निर्देशों के अनुसार बिना मृत्यु प्रमाण पत्र के नाम नहीं हटाने की व्यवस्था के कारण पिछले 14 वर्षों में यह संख्या जमा होती गई थी, जिसे अब साफ किया गया।
3.0 करोड़ वोट (अनुपस्थित/अप्राप्त मतदाता): भौतिक सत्यापन के दौरान जो लोग अपने दिए गए पते पर नहीं मिले। इनमें अवैध रूप से रह रहे ऐसे लोग भी शामिल हैं जो कानूनी पहचान के डर से सामने नहीं आए।
भाजपा नेता ने तंज कसते हुए कहा:
“विपक्ष का असली दर्द 13 करोड़ वोटों का नहीं, बल्कि उन 3 करोड़ फर्जी वोटों का है जो अब तक उनका सुरक्षित वोट बैंक बने हुए थे। SIR की इस प्रक्रिया से मतदाता सूची शुद्ध और पारदर्शी हुई है, जिससे भविष्य में मतदान केंद्रों पर होने वाली फर्जी वोटिंग और विवाद हमेशा के लिए समाप्त होंगे।”
प्रेस वार्ता के अंत में नेता ने कांग्रेस के दोहरे चरित्र को उजागर करते हुए याद दिलाया कि सोनिया गांधी का नाम 1980 की मतदाता सूची में शामिल था, जबकि उन्हें भारत की नागरिकता 1983 में मिली थी। उन्होंने कहा कि जिस दल का इतिहास ही नियमों को ताक पर रखने का रहा हो, उसे मतदाता सूची की शुद्धता पर सवाल उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
