हांसी की अनाज मंडी की ये विडिओ देखकर सबका मन विचलित हो उठा था। विडियो ट्रैक्टरों की आवाजें, मजदूरों की चिल्लाहट और अनाज के बोरे खिसकने की खड़खड़ाहट के बीच बडसी गुजरान गांव का एक बीमार बुजुर्ग किसान धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। इसकी उम्र साठ के पार थी, शरीर इतना कमजोर कि हर कदम पर सांस फूल रही थी। कई दिनों से अस्पताल में भर्ती रहने के बाद भी उसे घर नहीं लौटने दिया गया था।क्योकी गेहूं की फसल कटकर हांसी मंडी के गेट पर खड़ी थी।
उसके बच्चे गेहूं की फसल लेकर पहले ही मंडी पहुंच चुके थे। अच्छी फसल थी, महीनों की मेहनत का नतीजा। लेकिन गेट पर एंट्री नहीं हो पा रही थी। नया नियम आया था बायोमेट्रिक अंगूठा लगाना जरूरी। बिना किसान के खुद के अंगूठे के कोई गेट पास नहीं, कोई खरीद नहीं। बच्चे ने बहुत समझाया, कहा कि पिता अस्पताल में हैं, सांस लेने में तकलीफ है, लेकिन कोई नहीं माना। सिस्टम सख्त था।
अंत में मजबूरी में वही किसान अस्पताल से निकलकर मंडी पहुंचा। उसके साथ पेशाब की थैली लटक रही थी, जो डॉक्टरों ने लगाई हुई थी। शरीर पर अस्पताल का गाउन अभी भी था। चेहरा पीला पड़ गया था, आंखें थकी हुईं, लेकिन हाथ कांपते हुए भी उसने स्कैनर की तरफ बढ़ाया। अंगूठा लगाया, और तभी गेहूं की एंट्री हुई। आसपास खड़े लोग चुपचाप देख रहे थे। कोई कुछ बोल नहीं पा रहा था।
यह दृश्य देखकर दिल बैठ जाता है। किसान तो वो है जो सुबह से शाम तक खेत में जुटा रहता है। गर्मी में पसीना बहाता है, बारिश में कीचड़ में फिसलता है, सर्दी में ठिठुरता है। फसल उगाने में न सिर्फ मेहनत लगती है, बल्कि उम्मीद भी। उम्मीद कि इस बार अच्छा दाम मिलेगा, परिवार का खर्च चलेगा, कर्ज का बोझ हल्का होगा। लेकिन जब फसल तैयार हो जाती है, तब शुरू होती है नई लड़ाई।
किसान की समस्याएं छोटी-छोटी नहीं होतीं। बीज महंगे, खाद महंगी, पानी की कमी, बिजली कटौती, मौसम की अनिश्चितता सब कुछ एक साथ आ जाता है। फसल कटने के बाद मंडी तक पहुंचाना भी आसान नहीं। ट्रैक्टर का किराया, मजदूरों का भुगतान, और फिर मंडी में घंटों इंतजार। अब तो नए नियम और सख्त हो गए हैं। अंगूठा लगाना, गारंटर जुटाना, दस्तावेज दिखाना सब किसान के कंधों पर। अगर किसान बीमार है, बुजुर्ग है या दूर है, तो क्या? फसल तो खेत में नहीं सड़ सकती।
इस किसान की तरह कितने ही अन्नदाता हर साल इसी तरह की तकलीफ झेलते हैं। कुछ तो फसल बेचने के चक्कर में अपना इलाज छोड़ देते हैं। कुछ परिवार के छोटे बच्चों को स्कूल से उठाकर मंडी भेज देते हैं। कुछ तो इतने परेशान हो जाते हैं कि फसल बेचने की बजाय स्थानीय व्यापारियों को सस्ते में थमा देते हैं। दाम कम मिलते हैं, लेकिन कम से कम चक्कर तो नहीं लगाने पड़ते।
किसान की जिंदगी में आराम नाम की चीज बहुत कम होती है। खेत से मंडी, मंडी से घर, फिर अगली फसल की तैयारी। बीच में बीमारी आ जाए, परिवार में कोई समस्या हो जाए, तो भी खेती रुकती नहीं। फसल तो समय पर बोनी और कटनी पड़ती है। लेकिन जब फसल बेचने का समय आता है, तब सिस्टम उसे और परेशान कर देता है। अस्पताल की बिस्तर से उठकर अंगूठा लगाने जाना पड़ता है, सांस फूलते हुए भी हाथ आगे बढ़ाना पड़ता है।
यह दृश्य सिर्फ हांसी मंडी का नहीं है। हरियाणा, पंजाब, यूपी जहां-जहां अनाज मंडियां हैं, वहां किसान अपनी कहानियां लेकर पहुंचते हैं। कोई कहता है कि दाम कम मिल रहे हैं, कोई कहता है कि बारिश में फसल बर्बाद हो गई, कोई कहता है कि कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। और बीच में ये नए-नए नियम, जो पारदर्शिता के नाम पर किसान की मजबूरी को और गहरा कर देते हैं।
उस बुजुर्ग किसान को देखकर लगता है कि हम अन्नदाता कहकर उसका सम्मान तो करते हैं, लेकिन उसकी तकलीफ को समझने में कहीं न कहीं चूक जाते हैं। वह जो देश को रोटी देता है, उसे खुद दो वक्त की रोटी के लिए इतनी मुश्किलें क्यों झेलनी पड़ती हैं? खेत में मेहनत करने वाला किसान जब अस्पताल से उठकर मंडी पहुंचता है, तो यह सिर्फ उसकी कहानी नहीं रह जाती। यह हमारी पूरी व्यवस्था की कहानी बन जाती है जहां अंगूठे की मुहर से ज्यादा जरूरी उसकी सेहत और उसकी इज्जत होनी चाहिए थी।
किसान की ये समस्याएं रोज की हैं। छोटी-छोटी लगती हैं, लेकिन जमा होकर बड़ी हो जाती हैं। एक किसान की दुर्गत देखकर पूरा देश सोचने लगता है। और जब वीडियो वायरल होता है, तो शहर वाले भी एक पल के लिए रुककर सोचते हैं आखिर यह अन्नदाता इतना असहाय क्यों है?
शायद समय आ गया है कि हम किसान की इन मुश्किलों को सिर्फ देखें नहीं, महसूस भी करें। क्योंकि जब तक उसकी सांस फूलती रहेगी मंडी में अंगूठा लगाने के लिए, तब तक हमारी थाली में रोटी का स्वाद भी अधूरा ही रहेगा #हरियाणा #किसान
