हरियाणा में श्रम विभाग के 1500 करोड़ रुपए के संभावित वर्क स्लिप घोटाले की जांच के लिए बनाई गई अग्रवाल कमेटी की आज फिर बैठक बुलाई गई है। यह बैठक 1 अप्रैल को तय थी, लेकिन कुछ कारणों से 3 अप्रैल तक टल गई थी और उस दिन भी बैठक नहीं हो पाई।

मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की ओर से सीनियर आईएएस पंकज अग्रवाल की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच कमेटी गठित की गई थी, जिसमें आईएएस राजीव रतन और आईपीएस पंकज नैन भी शामिल हैं। कमेटी को 31 मार्च तक रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन अफसरों की व्यस्तता के कारण बैठक प्रक्रिया में देरी हुई।

कमेटी के चेयरमैन पंकज अग्रवाल ने बताया कि बजट सत्र के कारण बैठकें स्थगित रही, लेकिन अब जांच प्रक्रिया तेज कर दी गई है। फिलहाल रिपोर्ट तैयार होने में लगभग 15 दिन का समय लग सकता है।

मुख्यमंत्री द्वारा गठित जांच कमेटी मामले की गहराई से जांच कर रही है और विभिन्न अधिकारियों तथा अन्य व्यक्तियों द्वारा की गई अनियमितताओं का कागजी अध्ययन कर रही है। कमेटी विभाग को सुधारात्मक और निवारक उपायों की सिफारिश भी करेगी, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं से बचा जा सके। कमेटी सभी तथ्यों की समीक्षा कर एक माह के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी।

बताया गया है कि विभागों की लगातार हो रही मीटिंगों के कारण कमेटी के अधिकारी जांच को पर्याप्त समय नहीं दे पाए। अफसरों के अनुसार, पिछले महीने बजट सत्र चल रहा था, जिसके कारण कमेटी बैठकें आयोजित नहीं हो सकीं।

श्रम मंत्री अनिल विज के अनुसार श्रम विभाग में वर्क स्लिप घोटाले का दायरा काफी बड़ा है और कई जिले इसमें संलिप्त पाए जा रहे हैं। पहले चरण में प्रदेश के 13 जिलों की जांच कराई गई थी, जिसके बाद मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने 9 और जिलों से भी रिपोर्ट तलब की है।

इसलिए कमेटी को पूरे प्रदेश में जांच शुरू करने से पहले इनपुट एकत्रित करना जरूरी है। जांच के लिए तैयार की गई रूपरेखा के तहत सभी प्रभावित जिलों के डीसी से नई रिपोर्ट मंगवाई गई है।

वर्क स्लिपों में गड़बड़ी सामने आने के बाद श्रम मंत्री अनिल विज ने इस घोटाले का खुद खुलासा किया था। उन्होंने बताया कि प्रारंभ में हिसार, कैथल, जींद, सिरसा, फरीदाबाद और भिवानी जिलों में जांच की गई, जहां कई गड़बड़ियां पाई गईं। इसके बाद राज्य के सभी जिलों के डीसी को निर्देश दिया गया कि वे जिला स्तर पर कमेटियां गठित करें। इन कमेटियों में श्रम विभाग के अधिकारी के साथ तीन अन्य अधिकारी भी शामिल किए गए।

जांच में सामने आया कि कुल 2 लाख 21 हजार 517 मजदूरों के नाम दर्ज थे, लेकिन सही पाए गए केवल 14,240 मजदूर। जबकि 1 लाख 93 हजार 756 मजदूरों के नाम फर्जी निकले। इसका अर्थ है कि बड़े पैमाने पर गलत वर्क स्लिप और फर्जी मजदूरों के नाम दर्ज किए गए थे।

जांच से यह भी पता चला कि कई स्थानों पर पूरे गांव के लोग फर्जी तरीके से रजिस्ट्रेशन करवा रहे थे और वर्क स्लिप बनवा रहे थे, ताकि जिनका सरकारी योजनाओं में हक नहीं था, वे भी इसका लाभ उठा सकें

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