हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को पति की लंबी आयु के लिए विवाहित महिलाएं करवा माता के निमित्त निर्जला व्रत रखती हैं। इस व्रत के पुण्य-प्रताप से व्रती की हर मनोकामना पूरी होती है। साथ ही सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। इसके साथ ही पति को दीर्घायु का वरदान प्राप्त होता है।

व्रत का समापन करवा माता और चंद्र देव को अर्घ्य देने के बाद किया जाता है। इस समय व्रती छलनी में अपने पति का दर्शन करती हैं। वहीं, पति पानी पिलाकर व्रती का पारण कराते हैं। आइए, करवा चौथ की पूजा विधि से लेकर चंद्र देव के दर्शन तक का सही समय जानते हैं

वैदिक पंचांग के अनुसार, शुक्रवार 10 अक्टूबर को करवा चौथ मनाया जाएगा। यह पर्व हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस शुभ अवसर पर महिलाएं सूर्योदय से पहले सरगी खाकर व्रत शुरू करती हैं। वहीं, संध्या काल में चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोलती हैं।

कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर सिद्धि और शिववास योग कई दुर्लभ एवं मंगलकारी योग बन रहे हैं। करवा चौथ के कृत्तिका और रोहिणी नक्षत्र का संयोग बन रहा है। इसके साथ ही बव, बालव और तैतिल योग का निर्माण हो रहा है।

?करवा चौथ व्रत की कथा?

बहुत समय पहले की बात हैं वीरवती नाम की एक राजकुमारी थी। जब वह बड़ी हुई तो उसकी शादी एक राजा से हुई। शादी के बाद वह करवा चौथ का व्रत करने के लिए मां के घर आई। वीरवती ने भोर होने के साथ ही करवा चौथ का व्रत शुरू कर दिया। वीरवती बहुत ही कोमल व नाजुक थी। वह व्रत की कठोरता सहन नहीं कर सकी। शाम होते होते उसे बहुत कमजोरी महसूस होने लगी और वह बेहोश सी हो गई। उसके सात भाई थे और उसका बहुत ध्यान रखते थे। उन्होंने उसका व्रत तुड़वा देना ठीक समझा। उन्होंने पहाड़ी पर आग लगाई और उसे चांद निकलना बता कर वीरवती का व्रत तुड़वाकर भोजन करवा दिया। जैसे ही वीरवती ने खाना खाया उसे अपने पति की मृत्यु का समाचार मिला। उसे बड़ा दुःख हुआ और वह पति के घर जाने के लिए रवाना हुई। रास्ते में उसे शिवजी और माता पार्वती मिले। माता ने उसे बताया कि उसने झूठा चांद देखकर चौथ का व्रत तोड़ा है। इसी वजह से उसके पति की मृत्यु हुई है। वीरवती अपनी गलती के लिए क्षमा मांगने लगी। तब माता ने वरदान दिया कि उसका पति जीवित तो हो जायेगा लेकिन पूरी तरह स्वस्थ नहीं होगा।

वीरवती जब अपने महल में पहुंची तो उसने देखा राजा बेहोश था और शरीर में बहुत सारी सुइयां चुभी हुई थी। वह राजा की सेवा में लग गई। सेवा करते हुए रोज एक एक करके सुई निकालती गई। एक वर्ष बीत गया। अब करवा चौथ के दिन बेहोश राजा के शरीर में सिर्फ एक सुई बची थी। रानी वीरवती ने करवा चौथ का कड़ा व्रत रखा। वह अपनी पसंद का करवा लेने बाजार गई। पीछे से एक दासी ने राजा के शरीर से आखिरी सुई निकाल दी। राजा को होश आया तो उसने दासी को ही रानी समझ लिया। जब रानी वीरवती वापस आई तो उसे दासी बना दिया गया। तब भी रानी ने चौथ के व्रत का पालन पूरे विश्वास से किया। एक दिन राजा किसी दूसरे राज्य जाने के लिए रवाना हो रहा था। उसने दासी वीरवती से भी पूछ लिया कि उसे कुछ मंगवाना है क्या।

वीरवती ने राजा को एक जैसी दो गुड़िया लाने के लिए कहा। राजा एक जैसी दो गुड़िया ले आया। वीरवती हमेशा गीत गाने लगी “रोली की गोली हो गई …..गोली की रोली हो गई” ( रानी दासी बन गई , दासी रानी बन गई )। राजा ने इसका मतलब पूछा तो उसने अपनी सारी कहानी सुना दी । राजा समझ गया और उसे बहुत पछतावा हुआ। उसने वीरवती को वापस रानी बना लिया और उसे वही शाही मान सम्मान लौटाया। माता पार्वती के आशीर्वाद से और रानी के विश्वास और भक्ति पूर्ण निष्ठा के कारण उसे अपना पति और मान सम्मान वापस मिला।

करवाचौथ पर सुहागिन महिलाएं सज-धजकर एक जगह इकठ्ठी होती हैं और कथा सुनती हैं। कथा के बाद गोले में बैठकर अपनी पूजा थाली एक-दूसरे के साथ बांटती हैं। थाली को घड़ी की दिशा में घुमाने के समय वीरो कुड़िए करवड़ा गीत गाया जाता है। इस लोकप्रिय पंजाबी करवाचौथ गीत के बोल इस प्रकार हैं:

ले वीरा कुड़िए करवड़ा, ले सर्व सुहागन करवड़ा, करवड़ा वटाया जीवन दा झोली पाया
सुतड़ा उठावीं न, रुठड़ा मनावीं न
हलवान पैर पाई न
पाटड़ा सीवीं न मैलड़ा धोवीं न ,कट्टी न अटेरीं न, खूंब चरखड़ा फेरीं ना,
ग्वांड पैर पाईं ना, सुई च धागा फेरीं ना,
सात प्यारी वीरा, चंद चढ़े ते पानी पीवां
लै वीरा कुड़िए करवड़ा, लै सर्व सुहागिन करवड़ा।।

यह लोकप्रिय गीत उन बातों के इर्द-गिर्द घूमता है, जिन्हें करवाचौथ के दिन करने की मनाही होती है।

करवाचौथ पर पूजा थाली घुमाने की रस्म के बाद सुहागिन महिलाएं अपनी सास का आशीर्वाद लेती हैं और उन्हें व्रत में पूजन थाली में रखा सामान उपहार स्वरूप भेंट करती है

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