सुप्रीम कोर्ट ने तीन साल की बच्ची के रेप के मामले में असंवेदनशील रवैये के लिए हरियाणा पुलिस और उसकी बाल कल्याण समिति को जमकर फटकार लगाई। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक हरियाणा पुलिस द्वारा तीन साल की रेप पीड़िता से मिलने के बजाय उसे थाने बुलाना शर्मनाक है।
सख्त टिप्पणी करते हुए कहा- पुलिस अफसरों को देखिए, उनकी पोजिशन देखिए। पुलिस स्टेशन में डिप्टी पुलिस कमिश्नर, ASP रहते हैं। 3 साल के बच्ची के साथ हुए अपराध में आपकी यही समझ है तो फिर कानून किसे कहेंगे? यह शॉकिंग है। पुलिस पीड़ित के घर क्यों नहीं जा सकती? क्या वे राजा हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के लिए हरियाणा कैडर की महिला आईपीएस अधिकारियों सहित तीन सदस्यीय विशेष जांच दल का गठन किया है। साथ ही हरियाणा सरकार को शीघ्र ही विशेष जांच दल गठित करने का निर्देश दिया। इसके अलावा गुरुग्राम पुलिस को गुरुवार तक मामले के रिकॉर्ड सौंपने को कहा है।
दरअसल, 4 फरवरी 2026 को एक व्यक्ति ने गुरुग्राम के थाना सेक्टर-53 में शिकायत दर्ज करवाई थी कि उनकी सोसाइटी की दो मेड और एक व्यक्ति ने उसकी 3 वर्षीय बेटी के साथ अश्लील हरकत और यौन शोषण किया। दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 के बीच तीन लोगों ने यह घिनौना अपराध किया।
इस शिकायत पर पुलिस ने POCSO एक्ट की धारा 6, धारा 17 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 65(2) (12 साल से कम उम्र की बच्ची से बलात्कार) के तहत केस दर्ज किया। मगर, शुरुआत से ही पुलिस ने मामले में लापरवाही दिखाई। शुरू में दो महिलाओं को डिटेन किया गया, लेकिन तुरंत गिरफ्तारी नहीं हुई। पुरुष आरोपी का नाम FIR में शुरू में नहीं था।
इसके बाद मामले को बाल कल्याण समिति (CWC) को रेफर किया गया। माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें CBI या SIT जांच की मांग की गई। उनका आरोप था कि हरियाणा पुलिस की जांच निष्पक्ष और संतोषजनक नहीं है। CCTV फुटेज नहीं लिया, सबूत इकट्ठा नहीं किए, गिरफ्तारी में देरी हुई।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर होने के बाद पुलिस ने 22 मार्च 2026 को तीनों आरोपियों को गिरफ्तार किया, जिनमें दो यूपी और पश्चिम बंगाल की रहने वाली दो महिलाएं और एक पुरुष शामिल है। पुलिस ने पुरुष को पश्चिम बंगाल की रहने वाली महिला का पति बताया।
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने बीते शुक्रवार को सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की पीठ के समक्ष मामले का तत्काल उल्लेख किया और आर्टिकल 32 के तहत दायर याचिका पर तुरंत सुनवाई की मांग की। रोहतगी ने अदालत को बताया कि यह एक भयानक मामला है। बताया कि पीड़ित बच्ची को पुलिस स्टेशन, CWC, मेडिकल परीक्षण आदि के लिए बार-बार ले जाया गया, जो कानून के मुताबिक नहीं था।
सोमवार को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सीजेआई ने एक मजिस्ट्रेट द्वारा बंद कमरे में आरोपी के सामने 30 मिनट तक बच्ची का बयान लेने पर सख्त टिप्पणी की। कहा- “यह शॉकिंग और इंसेंसिटिव है”।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में हरियाणा सरकार और DGP आदि को नोटिस जारी किया गया। गुरुग्राम पुलिस कमिश्नर और जांच अधिकारी को 25 मार्च 2026 को सभी रिकॉर्ड लेकर पेश होने को कहा। इसके अलावा मामले की जांच के लिए हरियाणा कैडर की महिला आईपीएस अधिकारियों सहित तीन सदस्यीय विशेष जांच दल का गठन किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने लापरवाही से जांच करने के लिए गुरुग्राम पुलिस अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया और पूछा कि उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए। बाल कल्याण समिति के सदस्यों को कारण बताओ नोटिस जारी किया और पूछा कि उन्हें क्यों नहीं हटाया जाना चाहिए।
