रोहतक, 12 जून। भारतीय आयुर्विज्ञान अनमिडास प्रोजेक्ट से अब तक 5 शोध पत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं, जिनका इम्पैक्ट फैक्टर 5.5 तक है। प्रोजेक्ट के निष्कर्षों को कई राष्ट्रीय सम्मेलनों में प्रस्तुत किया गया, जहां इसे बेस्ट पेपर अवार्ड से भी नवाजा गया। इस प्रोजेक्ट से एक राष्ट्रीय स्तर का ओपन इमेज डाटासेटचान की जा रही है। परियोजना का नेतृत्व पीजीआईडीएस के ओरल पैथोलॉजी विभाग की वरिष्ठ प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. माला कांबोज कर रही हैं।
पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एच.के. अग्रवाल ने मिडास प्रोजेक्ट की उपलब्धियों पर प्रसन्नता जताते हुए कहा कि पीजीआईडीएस रोहतक का यह प्रयास डिजिटल हेल्थ के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होगा। एआई आधारित यह तकनीक ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में मुंह के कैंसर की समय पर पहचान कर हजारों जिंदगियां बचाने में मददगार होगी। तंबाकू से होने वाली बीमारियों का बोझ हरियाणा में ज्यादा है, ऐसे में यह प्रोजेक्ट हमारे क्षेत्र के लिए विशेष महत्व रखता है। डॉ एच के अग्रवाल ने कहा कि उन्हें गर्व है कि उत्तर भारत से सिर्फ पीजीआईडीएस रोहतक को इस राष्ट्रीय प्रोजेक्ट के लिए चुना गया। उन्होंने डॉ. माला कांबोज और उनकी पूरी टीम को बधाई दी। डॉ अग्रवाल ने कहा कि विश्वविद्यालय इस तरह के नवाचार और रिसर्च को हर संभव सहयोग देता रहेगा। कुलपति डॉ. एच.के. अग्रवाल, कुलसचिव डॉ. रूप सिंह, निदेशक डॉ. एस.के. सिंघल और प्राचार्या डॉ. मनु राठी ने डॉ. माला कांबोज को इस उपलब्धि पर बधाई दी और प्रोजेक्ट के अंतिम चरण के सफल समापन के लिए शुभकामनाएं दीं।
बॉक्स:
65 लाख से अधिक की परियोजना, 700 मरीज जुड़े
डॉ माला कंबोज ने बताया कि आईसीएमआर ने मिडास प्रोजेक्ट के लिए कुल 65 लाख 92 हजार 853 रुपये की राशि स्वीकृत की है, जिसमें से पहले दो वर्षों में 47 लाख 47 हजार 415 रुपये प्राप्त हो चुके हैं। यह परियोजना एम्स नई दिल्ली और भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) बेंगलुरु के सहयोग से चलाई जा रही है। उत्तर भारत से केवल पीजीआईडीएस रोहतक ही इस प्रोजेक्ट का हिस्सा है।
अब तक इस प्रोजेक्ट में 700 से अधिक मरीजों को शामिल किया जा चुका है। हजारों उच्च गुणवत्ता वाली क्लिनिकल और हिस्टोपैथोलॉजिकल तस्वीरों का डाटाबेस तैयार किया गया है। इसी डाटा के आधार पर एक एआई आधारित मोबाइल एप विकसित की जा रही है जो संदिग्ध घावों की तुरंत पहचान कर विशेषज्ञ तक रेफर करेगी। इससे निदान में देरी नहीं होगी और इलाज जल्दी शुरू हो सकेगा।
तंबाकू छोड़ने के लिए काउंसलिंग भी
डॉ माला कंबोज ने बताया कि प्रोजेक्ट के तहत मरीजों से तंबाकू, गुटखा, बीड़ी-सिगरेट के सेवन की पूरी जानकारी ली जाती है और उन्हें इसके खतरों के बारे में जागरूक किया जाता है। डॉ. माला कांबोज ने बताया कि समय पर पहचान से मुंह के कैंसर का इलाज आसान, सस्ता और ज्यादा सफल हो जाता है। मरीज की जान बचने के साथ-साथ उसके जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर रहती है।
बॉक्स:
5 अंतरराष्ट्रीय शोध पत्र प्रकाशित, मिला बेस्ट पेपर अवार्ड
डॉ माला ने कहा कि मिडास प्रोजेक्ट से अब तक 5 शोध पत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं, जिनका इम्पैक्ट फैक्टर 5.5 तक है। प्रोजेक्ट के निष्कर्षों को कई राष्ट्रीय सम्मेलनों में प्रस्तुत किया गया, जहां इसे बेस्ट पेपर अवार्ड से भी नवाजा गया। इस प्रोजेक्ट से एक राष्ट्रीय स्तर का ओपन इमेज डाटासेट भी तैयार किया जा रहा है, जो भविष्य में एआई रिसर्च के लिए सभी वैज्ञानिकों को मुफ्त उपलब्ध होगा।
बॉक्स: क्यों जरूरी है शुरुआती जांच
कुलपति डॉ एच के अग्रवाल ने कहा कि हर साल भारत में मुंह के कैंसर के करीब 1.77 लाख से ज्यादा नए मामले सामने आते हैं। 70% से अधिक मरीज देरी से डॉक्टर तक पहुंचते हैं। यदि समय पर पता चल जाए तो 90% मरीजों का जीवन बचाया जा सकता है। मुंह में तीन सप्ताह से ज्यादा समय तक रहने वाला छाला, सफेद-लाल धब्बा, जलन या मुंह खोलने में दिक्कत हो तो तुरंत डेंटल विशेषज्ञ को दिखाएं।
