रोहतक। PGIMS रोहतक के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. कुंदन मित्तल की पुनर्नियुक्ति को लेकर चल रहा विवाद अब पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट तक पहुंच गया है। हाईकोर्ट ने फिलहाल डॉ. मित्तल की तीन साल की पुनर्नियुक्ति के आदेश के संचालन पर अंतरिम रोक लगा रखी है। वहीं, इस मामले में पूर्व मंत्री की ओर से की गई सिफारिशी चिट्ठी सामने आने के बाद राजनीतिक चर्चाएं भी तेज हो गई हैं।
मामले के मुताबिक, डॉ. कुंदन मित्तल 30 जून 2026 को 65 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त हुए थे। इसके बाद 1 जुलाई से डॉ. सुजाता सेठी को मेडिकल सुपरिंटेंडेंट का अतिरिक्त प्रभार दिया गया। इसी दौरान डॉ. मित्तल की पुनर्नियुक्ति की प्रक्रिया भी आगे बढ़ी। हाईकोर्ट में पेश किए गए रिकॉर्ड के अनुसार, डॉ. मित्तल ने 14 मई को पुनर्नियुक्ति के लिए व्यक्तिगत प्रतिवेदन दिया था। इसके अगले दिन, 15 मई को एक पूर्व मंत्री ने मुख्यमंत्री को उनके पक्ष में सिफारिशी पत्र लिखा।वायरल हुए इस पत्र में डॉ. मित्तल को कुशल प्रशासक और विशेषज्ञ डॉक्टर बताते हुए उनके पद पर बने रहने की सिफारिश की गई थी। पत्र में पार्टी कार्यकर्ताओं और जमीनी स्तर के स्वयंसेवकों की मदद किए जाने का भी उल्लेख किया गया था। साथ ही विश्वविद्यालय और क्षेत्र में पार्टी हितों को आगे बढ़ाने के लिए उनके पद पर बने रहने की बात कही गई थी।
इसके बाद 3 अगस्त 2026 को डॉ. कुंदन मित्तल की तीन साल के लिए पुनर्नियुक्ति का आदेश जारी किया गया। 6 अगस्त को यूनिवर्सिटी की Executive Council ने भी इस पुनर्नियुक्ति को मंजूरी दे दी।इसी पुनर्नियुक्ति को बाद में हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। याचिका में नियुक्ति के लिए निर्धारित उम्र सीमा को लेकर प्रमुख सवाल उठाया गया है।याचिका में यूनिवर्सिटी के Statutes के Rule 2(d) का हवाला देते हुए कहा गया कि मेडिकल सुपरिंटेंडेंट के पद पर नियुक्ति के लिए 58 वर्ष की उम्र सीमा निर्धारित है। ऐसे में 65 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्त हुए डॉ. मित्तल को तीन साल के लिए पुनर्नियुक्त किए जाने पर सवाल उठाया गया।इसके साथ ही यह कानूनी सवाल भी उठाया गया कि यदि संबंधित नियम में 58 वर्ष की सीमा निर्धारित है, तो क्या Executive Council को इस उम्र सीमा में छूट देने का अधिकार है।
इस पूरे मामले में पूर्व मंत्री की सिफारिशी चिट्ठी भी चर्चा के केंद्र में है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हाईकोर्ट ने अभी यह अंतिम फैसला नहीं दिया है कि राजनीतिक सिफारिश के कारण नियुक्ति गलत या अवैध थी। सिफारिशी पत्र और नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े सवाल याचिका में उठाए गए मुद्दों का हिस्सा हैं और मामले पर अंतिम निर्णय अभी बाकी है।पूर्व मंत्री ने पत्र लिखने की बात स्वीकार करते हुए कहा है कि लोग सिफारिश के लिए उनके पास आते हैं और किसी की मदद के लिए सिफारिश करने में उन्हें गलत नहीं लगता। उनका यह भी कहना है कि सरकार की मौजूदा नीति के तहत सरकारी डॉक्टरों को 70 वर्ष की उम्र तक पुनर्नियुक्त किया जा सकता है। वहीं डॉ. कुंदन मित्तल की ओर से मीडिया में कहा गया कि इस तरह के पत्र आते रहते हैं और इस पत्र का कोई उचित आधार या प्रासंगिकता नहीं है।
16 सितंबर 2026 को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ की पीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। कोर्ट ने फिलहाल 3 अगस्त के पुनर्नियुक्ति आदेश और 6 अगस्त के Executive Council के प्रस्ताव के संचालन पर रोक लगा दी।यानी फिलहाल डॉ. कुंदन मित्तल की तीन साल की पुनर्नियुक्ति पर अंतरिम रोक है। हालांकि कोर्ट ने यूनिवर्सिटी को यह स्वतंत्रता दी है कि वह लागू कानून और नियमों के अनुसार मेडिकल सुपरिंटेंडेंट की नियुक्ति कर सकती है।
राज्य सरकार और यूनिवर्सिटी को मामले में अपना जवाब दाखिल करना है। मामले की अगली सुनवाई 4 मार्च 2027 को निर्धारित है।फिलहाल इस मामले में तीन प्रमुख पहलू चर्चा में हैं—पुनर्नियुक्ति का आदेश, 58 साल की उम्र सीमा से जुड़े नियम और पूर्व मंत्री की सिफारिशी चिट्ठी। हाईकोर्ट की ओर से पुनर्नियुक्ति पर अंतरिम रोक लगाई जा चुकी है, लेकिन मामले की वैधता और अंतिम निर्णय पर अभी16 सितंबर 2026 को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ की पीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। कोर्ट ने फिलहाल 3 अगस्त के पुनर्नियुक्ति आदेश और 6 अगस्त के Executive Council के प्रस्ताव के संचालन पर रोक लगा दी।
यानी फिलहाल डॉ. कुंदन मित्तल की तीन साल की पुनर्नियुक्ति पर अंतरिम रोक है। हालांकि कोर्ट ने यूनिवर्सिटी को यह स्वतंत्रता दी है कि वह लागू कानून और नियमों के अनुसार मेडिकल सुपरिंटेंडेंट की नियुक्ति कर सकती है।राज्य सरकार और यूनिवर्सिटी को मामले में अपना जवाब दाखिल करना है। मामले की अगली सुनवाई 4 मार्च 2027 को निर्धारित है। अदालत का फैसला आना बाकी है।

