मथुरा में श्री कृष्ण जन्मभूमि और ईदगाह मस्जिद विवाद को लेकर एक याचिका की सुनवाई के लिए मथुरा जिला अदालत ने मंजूरी दे दी है। जानकारी के लिए आपको बता दें याचिका में जिस पर शाही ईदगाह मस्जिद बनी है का मालिकाना हक हिंदू पक्ष को सौंपने की मांग की गई है।
माना जाता है कि शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण 17वीं सदी में मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश पर कृष्ण जन्मभूमि के बगल में वहां स्थित मंदिर को नष्ट करके किया गया था।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट और अन्य निजी पक्षों ने याचिका में अपील की है कि ईदगाह मस्जिद को हटाकर भूमि का मालिकाना हक उन्हें सौंपा जाए। ईदगाह मस्जिद श्रीकृष्ण जन्मभूमि के बगल में बनी है, जिसे भगवान कृष्ण की जन्मस्थली माना जाता है। ये पूरा विवाद 13.37 एकड़ की उस भूमि को लेकर है, जिसके बारे में याचिकाकर्ताओं का दावा है कि ये भगवान श्रीकृष्ण विराजमान से संबंधित है।
याचिका को पहले निचली अदालत ने सितंबर 2020 में खारिज कर दिया था और फिर इस मामले में जिला जज के सामने रिवीजन पिटीशन दायर की गई थी। अब इस दीवानी मुकदमे की सुनवाई निचली अदालत करेगी।
राजस्व रिकॉर्ड देखने के अलावा, अदालत को मंदिर प्रबंधन प्राधिकरण-श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान और मस्जिद ईदगाह ट्रस्ट के बीच 1968 के समझौते की वैधता भी तय करनी होगी। इस समझौते में मंदिर प्राधिकरण ने भूमि के विवादास्पद हिस्से को ईदगाह को दे दिया था।
जिस याचिका पर आदेश जारी हुआ उसमें क्या मांग की गई है?
2020 में लखनऊ की वकील रंजना अग्निहोत्री ने छह अन्य लोगों के साथ मिलकर सिविल कोर्ट में एक याचिका डाली थी। याचिका में शाही ईदगाह मस्जिद को मंदिर परिसर से हटाने की मांग की गई थी। रंजना ने श्रीराम जन्म भूमि पर भी एक किताब लिखी है। उन्होंने श्री कृष्ण विराजमान के परिजन की ओर से यह मुकदमा करने का दावा किया।
याचिकाकर्ताओं ने अपने तर्क में कहा है कि जिस मूल कारागार, यानी जेल में भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था वह ईदगाह मस्जिद मैनेजमेंट कमेटी की ओर से बनाए गए कंस्ट्रक्शन के नीचे स्थित है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि खुदाई के बाद कोर्ट के सामने सही तथ्य सामने आ सकेगा।
कुछ स्थानीय वकील भी मामले में याचिकाकर्ता के रूप में शामिल हुए हैं। इसमें मंदिर ट्रस्ट और शाही ईदगाह को याचिका का जवाब देने के लिए पक्षकार बनाया गया है।
सितंबर 2020 में जज छाया शर्मा ने सुनवाई के आधार पर याचिका को खारिज कर दिया था। जज ने कहा था कि अग्निहोत्री और अन्य याचिकाकर्ताओं के पास ठिकाना नहीं था और जब मंदिर प्रबंधन प्राधिकरण पहले से मौजूद है, तो वे देवता के निकटतम परिजन नहीं हो सकते।
कोर्ट ने यह भी कहा कि मंदिर और शाही ईदगाह के बीच 1968 में समझौता हुआ था, जिसे बाद में अदालत के एक फरमान के जरिए औपचारिक रूप दिया गया था।
इस विवाद को लेकर अब तक कितने मुकदमे हुए हैं?
जानकारी के लिए आपको बता दें कि इस विवाद को लेकर मथुरा की स्थानीय अदालतों में अब तक कम से कम एक दर्जन केस फाइल हो चुके हैं। इन सभी याचिकाओं में एक आम मांग 13.37 एकड़ के परिसर से शाही ईदगाह मस्जिद को हटाए जाने की है। ये मस्जिद कटरा केशव देव मंदिर के पास स्थित है। माना जाता है कि भगवान कृष्ण का जन्म इसी मंदिर परिसर में हुआ था। याचिकाओं की अन्य अपीलों में वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद की तरह ईदगाह मस्जिद का भी सर्वे कराए जाने और वहां पूजा का अधिकार दिए जाने की मांग शामिल है।
वहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट एडवोकेट महक माहेश्वरी की उस जनहित याचिका की सुनवाई भी कर रहा है, जिसमें शाही ईदगाह मस्जिद को सरकार द्वार अधिग्रहित किए जाने की मांग की गई है। इस PIL को शुरू में सुनवाई के लिए वकील के उपस्थित न होने की वजह से खारिज कर दिया था, लेकिन बाद में चीफ जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस प्रकाश पडिया की बेंच ने इस याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया। इस पर अगली सुनवाई 25 जुलाई को होने की संभावना है।
एक अलग मामले में, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 मई को मथुरा के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) को कृष्ण जन्मभूमि मुद्दे पर मामलों का चार महीने के अंदर फैसला करने का निर्देश दिया। जस्टिस सलिल कुमार राय मनीष यादव की उस याचिका की सुनवाई कर रह रहे थे, जिन्होंने खुद को देवता का निकटतम रिश्तेदार होने का दावा किया है। मनीष ने अपनी याचिका में शाही ईदगाह मस्जिद परिसर में प्रवेश पर अस्थाई रोक लगाने की मांग की है।
