फाल्गुन महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को महाशिवरात्रि का त्योहार बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। खासकर शिव भक्त महाशिवरात्रि और सावन का साल भर इंतजार करते हैं। इस बार यह त्योहार 18 फरवरी को मनाया जाएगा। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पूरी विधि और नियमों के अनुसार, भगवान शिव की पूजा करने से भक्तों को पुण्य मिलता है और जीवन के कष्ट भी दूर होते हैं। इस दिन शिव भक्त व्रत भी रखते हैं। यदि आप भी इस बार महाशिवरात्रि पर व्रत रखने वाले हैं तो यहां पर पढ़ें व्रत की कथा..

 शिवरात्रि व्रत की कथा 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पुराने समय में चित्रभानु नाम का एक शिकारी था। शिकारी अपने परिवार का पालन पोषण करने के लिए एक दिन जंगल में शिकार करने गया परंतु भागदौड़ करने के बाद भी उसे जगंल में कुछ प्राप्त नहीं हुआ। वह भूख से व्याकुल होने लगा। शिकार ढूंढता ढूंढता शिकारी नदी के किनारे एक बेलपत्र के पेड़ पर चढ़कर बैठ गया। बेलपत्र के पेड़ के नीचे एक शिवलिंग बना हुआ था जो बेलपत्रों से ढका हुआ था, लेकिन शिकारी को इस बात का बिल्कुल भी पता नहीं था। आराम करने के लिए उसने बेलपत्र की कुछ शाखाएं तोड़ी और इसी दौरान कुछ बेलपत्र की पत्तियां शिवलिंग पर गिर गई।

शिकारी भूखा प्यासा उसी स्थान पर बैठा रहा। इसी तरह शिकारी का व्रत भी हो गया उसी दौरान एक गर्भिणी हिरणी तालाब पर पानी पीने के लिए आई। हिरणी के देख शिकारी ने धनुष पर जैसे तीर चढ़ाकर हिरणी को मारने की कोशिश की वैसे ही हिरणी बोली मैं गर्भ से हूं, जल्दी बच्चे को जन्म दूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे?यह सही नहीं होगा, मैं अपने बच्चे को जन्म देकर जल्द ही तुम्हारे पास आऊंगी तब तुम मेरा शिकार कर लेना । शिकारी ने तीर वापिस ले लिया और हिरणी भी वहां से चली गई। धनुष रखने के दौरान कुछ बिल्व पत्र दोबारा से टूटकर शिवलिंग पर गिर गए और अनजाने में प्रथम प्रहर की पूजा भी पूरी हो गई। कुछ समय के बाद एक ओर हिरणी उधर से निकली जिसे पास आता देख शिकारी ने दोबारा से धनुष पर तीर चढ़ा लिया लेकिन तभी हिरणी ने शिकारी से निवेदन किया कि मैं थोड़ी देर पहले ही ऋतु से निवृत्त हुई हूं, कामातुर विरहिणी हूं, अपने पति को खोज रही हूं। मैं अपने पति ने मिलकर जल्द ही तुम्हारे पास आ जाउंगी। शिकारी ने उस हिरणी को भी जाने दिया और शिकार सोचने लगा और इस दौरान रात का आखिरी प्रहर भी बीत गया। इसके बाद धनुष से कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जाकर गिर गए और दूसरे प्रहर की पूजा भी पूरी हो गई। इसके बाद शिकारी को तीसरी हिरणी नजर आई जो अपने बच्चों के साथ वहां से जा रही थी शिकारी धनुष उठाकर निशाना साधने लगा इतने में हिरणी बोली कि मैं अपने बच्चों को इनके पिता को सौंप कर लौट आउंगी। मुझे अभी जाने दो । शिकारी ने ऐसा करने से मना कर दिया उसने बोला कि मैं ऐसे ही दो हिरणियों को छोड़ चुका हूं। तब हिरणी बोली कि मेरा विश्वास करो मैं वापिस आने का तुम्हें वचन देती हूं।

शिकारी को हिरणी की बातें सुनकर उसपर दया गई और उसने उसे भी जाने दिया। इस बार फिर से भूखे प्यासे शिकारी से जाने अनजाने में बेल पत्र शिवलिंग पर गिर गए। सुबह की पहली किरण के साथ उसे एक मृग नजर आया शिकारी ने अपना धनुष निकाला और उस पर चलाने लगा तभी मृग दुखी होकर बोला कि तुमने मुझसे पहले आने वाली तीन हिरणियों और बच्चों को मार दिया है तो मुझे भी मार दो, देर न करो क्योंकि मैं यह दुख सह नहीं सकता, मैं उन हिरणियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी छोड़ दो। मैं अपने परिवार से मिलकर वापस आ जाऊंगा। शिकारी ने उसे भी जाने दिया। इस दौरान सूर्य निकल आया था और सुबह हो चुकी थी। शिकारी से जाने अनजाने में ही व्रत, रात्रि जागरण और तीन प्रहरों की पूजा और शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। भगवान शिव की कृपा से शिकारी को पूजा का फल मिला और उसका दिल बदल गया। शिकारी का मन निर्मल हो गया। कुछ समय के बाद शिकारी के सामने सारा मृग का परिवार मौजूद था लेकिन शिकारी ने उनका शिकार नहीं किया और सभी को जाने दिया। 

इस दिन सुबह उठकर स्नान करके साफ-कपड़े पहनें। फिर व्रत का संकल्प लें। इसके बाद शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग का गन्ने के रस, कच्चे दूध, शुद्ध देसी घी से अभिषेक करें। इसके बाद भगवान शिव को  बेलपत्र, भांग, धतूरा, जायफल, मीठा पान, कमल गट्टा, फल, फूल, मिठाई, इत्र अर्पित करें। इसके बाद शिव चालीसा पढ़ें और आरती करें। 

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