चंडीगढ़। हरियाणा कांग्रेस में अंदरूनी खींचतान एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। हरियाणा विधानसभा के पूर्व स्पीकर और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कुलदीप शर्मा ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखकर रोहतक के कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
शर्मा ने दीपेंद्र हुड्डा को कांग्रेस कार्यसमिति से हटाने की मांग करते हुए आरोप लगाया है कि पूर्व कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को लेकर दिए गए बयान से सिख समुदाय में रोष पैदा हुआ है और इसका राजनीतिक नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है।
रविवार को लिखे पत्र में कुलदीप शर्मा ने कहा कि सज्जन कुमार के निधन के बाद दीपेंद्र हुड्डा द्वारा उन्हें लेकर की गई सकारात्मक टिप्पणी और उन्हें सम्मान दिए जाने की बात ने सिख समुदाय के एक वर्ग को आहत किया है। उन्होंने दावा किया कि हरियाणा और पंजाब के कुछ सिख मित्रों ने इस मुद्दे पर उनसे अपनी नाराजगी जाहिर की है।
शर्मा ने पत्र में कांग्रेस के लिए राजनीतिक खतरे की ओर भी इशारा किया है। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन के बाद देश में सिख समुदाय का बड़ा वर्ग कांग्रेस के पक्ष में आया था, लेकिन इस तरह के बयान से अब समुदाय के भीतर कांग्रेस को समर्थन देने को लेकर फिर से विचार की स्थिति बन रही है। उनका तर्क है कि विपक्षी दल इस मुद्दे को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
कुलदीप शर्मा ने यहां तक कहा कि दीपेंद्र हुड्डा का बयान पंजाब विधानसभा चुनाव के समय पार्टी के हितों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। उन्होंने कांग्रेस से सज्जन कुमार से पूरी तरह दूरी बनाए रखने की बात कहते हुए कहा कि जनता में दोबारा उभरे घावों को भरने के लिए दीपेंद्र हुड्डा को कांग्रेस कार्यसमिति से हटाया जाना चाहिए।
कुलदीप शर्मा के इस पत्र को केवल सज्जन कुमार प्रकरण तक सीमित नहीं माना जा रहा है। हरियाणा कांग्रेस में हुड्डा खेमे और पार्टी के दूसरे वरिष्ठ नेताओं के बीच खींचतान किसी से छिपी नहीं है।
लोकसभा चुनाव में उनके बेटे चाणक्य पंडित को टिकट नहीं मिलने के बाद से कुलदीप शर्मा की पार्टी नेतृत्व और हुड्डा खेमे से नाराजगी की चर्चा लगातार रही है। ऐसे में दीपेंद्र हुड्डा के खिलाफ सीधे कांग्रेस अध्यक्ष को पत्र लिखना इस अंदरूनी असंतोष को और राजनीतिक रूप से अहम बना देता है।
दिलचस्प बात यह है कि शर्मा ने अपने पत्र में केवल दीपेंद्र हुड्डा के बयान पर सवाल नहीं उठाया, बल्कि कांग्रेस नेतृत्व को यह संदेश देने की कोशिश की है कि पार्टी के एक महत्वपूर्ण सामाजिक आधार के बीच इस मुद्दे का असर पड़ सकता है। यानी विवाद अब व्यक्तिगत बयान से आगे बढ़कर पार्टी की राजनीतिक रणनीति और नेतृत्व के फैसलों तक पहुंच गया है।


