संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) और विभिन्न किसान संगठनों के आह्वान पर आज देशभर में ‘जेल भरो आंदोलन’ आयोजित किया जा रहा है। इसी कड़ी में करनाल में भी बड़ी संख्या में किसान जिला सचिवालय में एकत्रित होकर राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपेंगे। यह आंदोलन भारत छोड़ो दिवस की 84वीं वर्षगांठ के अवसर पर किया जा रहा है, जिसमें केंद्रीय ट्रेड यूनियनों का भी समर्थन प्राप्त है। किसान संगठनों का कहना है कि देश में गहराते कृषि, आर्थिक और सामाजिक संकट की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करना इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य है।

भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के प्रदेश अध्यक्ष रतनमान ने बताया कि यह विरोध कार्यक्रम पूरे देश के गांवों, पंचायतों, ब्लॉकों, जिलों, कस्बों और शहरों में आयोजित किया जा रहा है। इसके जरिए किसानों, कृषि मजदूरों, औद्योगिक श्रमिकों, ग्रामीण मजदूरों, आदिवासियों, कर्मचारियों, युवाओं और महिलाओं सहित सभी मेहनतकश वर्गों की सामूहिक आवाज को बुलंद किया जाएगा। उन्होंने कहा कि 9 दिसंबर 2021 को दिल्ली की सीमाओं पर हुए ऐतिहासिक किसान आंदोलन के बाद केंद्र सरकार ने जो लिखित आश्वासन दिए थे, उन्हें अब तक लागू नहीं किया गया है, जिससे किसानों में रोष है।

रतनमान ने बताया कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी, किसानों की कर्ज माफी, बिजली के निजीकरण पर रोक और आंदोलन के दौरान दर्ज मामलों को वापस लेने जैसे वादे अब तक अधूरे हैं। इसी के विरोध में किसान संगठनों ने देशव्यापी आंदोलन का रास्ता चुना है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति से हस्तक्षेप कर इन मांगों पर तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित करने की अपील की जाएगी।

किसान संगठनों ने ज्ञापन के माध्यम से कई अहम मांगें रखी हैं। इनमें भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते का विरोध करते हुए सभी मौजूदा मुक्त व्यापार समझौतों को रद्द करने की मांग शामिल है। किसानों का कहना है कि इससे भारतीय कृषि और उद्योग को नुकसान हो रहा है। इसके अलावा सभी फसलों पर लागत (सी2) पर 50 प्रतिशत लाभ जोड़कर एमएसपी की कानूनी गारंटी और सरकारी खरीद सुनिश्चित करने की मांग की गई है।
ग्रामीण ऋणग्रस्तता खत्म करने के लिए व्यापक कर्ज माफी लागू करने और किसान आत्महत्या के मामलों में प्रत्येक पीड़ित परिवार को 25 लाख रुपये मुआवजा देने की भी मांग उठाई गई है। साथ ही चारों श्रम संहिताओं को रद्द कर सभी श्रमिकों के लिए 42 हजार रुपये मासिक न्यूनतम वेतन तय करने की मांग भी शामिल है।

किसानों ने मनरेगा को मजबूत कर साल में 200 दिन का रोजगार और 700 रुपये प्रतिदिन मजदूरी सुनिश्चित करने की मांग रखी है। इसके अलावा विद्युत निजीकरण विधेयक 2025, बीज विधेयक 2025 और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम में प्रस्तावित संशोधनों को वापस लेने की मांग भी की गई है। किसानों ने जबरन भूमि अधिग्रहण और कॉरपोरेट आधारित भूमि पूलिंग पर रोक लगाने और भूमि अधिकारों की रक्षा की भी बात कही है।

किसान संगठनों ने भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को मजबूत करने, साइलो के निजीकरण को रोकने और अडानी व लीप इंडिया के एकाधिकार को खत्म करने की मांग रखी है। साथ ही कृषि और खाद्य क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति न देने की बात कही गई है।
इसके अलावा उर्वरकों की कमी और कालाबाजारी खत्म करने, सब्सिडी बहाल करने और पेट्रोल-डीजल की कीमतों को नियंत्रित करने की मांग भी उठाई गई है। किसानों ने सार्वजनिक क्षेत्र में फसल और पशुधन बीमा योजना लागू करने, हर खेत तक सिंचाई पहुंचाने और 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को 10 हजार रुपये मासिक पेंशन देने की भी मांग रखी है।

ज्ञापन में बाढ़ और सूखा राहत को पारदर्शी और समयबद्ध बनाने की मांग की गई है। साथ ही अनुसंधान एवं विकास के लिए केंद्रीय बजट का 6 प्रतिशत और जीडीपी का 3 प्रतिशत तथा शिक्षा के लिए जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च करने की बात कही गई है। सहकारी समितियों और किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को कॉरपोरेट नियंत्रण से बचाने और उन्हें लोकतांत्रिक बनाने की मांग भी रखी गई है।

रतनमान ने कहा कि राष्ट्रपति के समक्ष रखी गई मांगें देशभर के लाखों किसानों, श्रमिकों और आम नागरिकों की आकांक्षाओं और जरूरतों को दर्शाती हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि राष्ट्रपति अपने स्तर पर हस्तक्षेप कर केंद्र सरकार को इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार करने और जल्द समाधान निकालने के लिए प्रेरित करेंगे। किसान संगठनों को आशा है कि उनकी मांगों पर बिना देरी के उचित कार्रवाई की जाएगी।

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