हजारों वर्षों पुरानी सरस्वती नदी को फिर से प्रवाह देने की हरियाणा सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना अब वैज्ञानिक कसौटी पर आगे बढ़ेगी। नदी में स्थायी जलधारा सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने आईआईटी रुड़की की विशेषज्ञता लेने का फैसला किया है। संस्थान टोंस नदी और सरस्वती बेसिन के बीच संभावित जल संयोजन, भूजल पुनर्भरण और उपलब्ध जल स्रोतों का विस्तृत अध्ययन कर सरकार को रिपोर्ट देगा।
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में बुधवार को हरियाणा सरस्वती धरोहर विकास बोर्ड की बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। सरकार का मानना है कि आईआईटी रुड़की की तकनीकी रिपोर्ट से यह तय हो सकेगा कि सरस्वती में सालभर जल प्रवाह कैसे बनाए रखा जा सकता है और किन स्रोतों से नदी को पुनर्जीवित किया जा सकता है। बैठक में मुख्यमंत्री ने बोर्ड की उपलब्धियों पर आधारित रिपोर्ट का विमोचन भी किया।
इस दौरान मुख्यमंत्री के मुख्य प्रधान सचिव राजेश खुल्लर, मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी, अतिरिक्त मुख्य सचिव सुधीर राजपाल, एके सिंह, अनुराग अग्रवाल, जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के प्रधान सचिव पंकज यादव, कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के सदस्य सचिव डॉ़ अमित कुमार अग्रवाल, सूचना, जनसंपर्क एवं भाषा विभाग के महानिदेशक के़ मकरंद पांडुरंग, सरस्वती धरोहर विकास बोर्ड के सीईओ कुमार सुप्रवीण, उपाध्यक्ष धूमन सिंह किरमच, मुख्यमंत्री के ओएसडी बीबी भारती, पूर्व मंत्री सुभाष सुधा तथा चेयरमैन आशीष शर्मा चक्रपाणी सहित वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
बैठक में अधिकारियों ने बताया कि टोंस नदी को प्राचीन सरस्वती नदी प्रणाली के प्रमुख सहायक स्रोतों में माना जाता है। आईआईटी रुड़की यह अध्ययन करेगा कि टोंस नदी और बरसाती नालों के पानी को किस तरह सरस्वती तक लाया जा सकता है। इसके साथ ही संस्थान अलग-अलग जल स्रोतों की उपलब्धता, पानी की गुणवत्ता, भूजल स्तर और लंबे समय तक जल संरक्षण की संभावनाओं का भी आकलन करेगा। रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्ययोजना तैयार होगी।
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि सरस्वती नदी केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति की पहचान है। उन्होंने कहा कि परियोजना का उद्देश्य केवल नदी का पुनर्जीवन नहीं, बल्कि क्षेत्र में जल सुरक्षा, सिंचाई सुविधाओं और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देना भी है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि आदिबद्री सहित सरस्वती से जुड़े सभी कार्यों को तय समय सीमा में पूरा किया जाए। किसी भी स्तर पर तकनीकी लापरवाही या देरी स्वीकार नहीं की जाएगी।
बैठक में अधिकारियों ने बताया कि 350 एकड़ में बनाए जा रहे सरस्वती सरोवर में अब तक करीब 10 लाख क्यूसेक मिट्टी की खुदाई पूरी हो चुकी है। मुख्यमंत्री ने बैराज निर्माण की प्रगति की भी समीक्षा की और सिंचाई विभाग को काम में तेजी लाने के निर्देश दिए।
सरस्वती परियोजना के तहत पिहोवा क्षेत्र के विकास पर भी विशेष फोकस किया जा रहा है। करीब 56 करोड़ रुपये की संयुक्त योजना में प्राची सरस्वती सहायक नदी का सौंदर्यीकरण, घाट निर्माण, सीढ़ियां, सांस्कृतिक कार्यक्रम स्थल, पुल, तालाबों का विकास और प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार की योजना शामिल है। इसके अलावा पिहोवा में संग्रहालय एवं व्याख्या केंद्र विकसित करने पर भी विचार किया जा रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को सरस्वती के ऐतिहासिक महत्व से जोड़ा जा सके।
मुख्यमंत्री ने नदी को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए भी सख्त निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि आसपास के गांवों या शहरों से किसी भी स्थिति में बिना उपचारित पानी नदी में नहीं जाना चाहिए। इसके लिए सभी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की कार्यप्रणाली की नियमित निगरानी होगी। नगर निकाय, पंचायती राज और सिंचाई विभाग को आपसी समन्वय से इसकी जिम्मेदारी निभाने को कहा गया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरस्वती के संरक्षण के लिए जनभागीदारी जरूरी है। इसके लिए आदिबद्री से पिहोवा तक 40 से 50 प्रमुख स्थानों पर बड़े साइनेज बोर्ड लगाए जाएंगे, जिन पर सरस्वती नदी के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पौराणिक महत्व की जानकारी दी जाएगी। उनका कहना था कि जब लोग सरस्वती की विरासत को समझेंगे, तभी उसके संरक्षण का अभियान व्यापक जनआंदोलन का रूप ले सकेगा।

