पंजाब के किसान नेताओं ने खनौरी बॉर्डर पर हरियाणा पुलिस के हाथों 21 फरवरी को हुई अपने युवा साथी शुभकरण सिंह की मौत के बाद अपनी रणनीति बदल दी है। अब वे दो कदम आगे चार कदम पीछे की स्ट्रेटेजी पर चल रहे हैं। किसान अब यहां पक्का मोर्चा लगाने का मन बना चुके हैं। इसके लिए लोहे के एंगल से टैंट बनाए जा रहे हैं। यही वजह है कि अंबाला का शंभू बॉर्डर धीरे-धीरे दिल्ली के सिंघु बॉर्डर की शक्ल लेता जा रहा है।

किसान नेताओं का दावा है कि 21 फरवरी की हिंसा के बाद शंभू पर न तो उनके साथियों की संख्या कम हुई और न इरादे कमजोर पड़े। अब भी यहां 9 से 10 हजार लोग मौजूद हैं। 13 फरवरी को शंभू बॉर्डर पर 600 ट्रैक्टर-ट्रॉलियां थीं जिनकी संख्या अब एक हजार पार कर जाने का दावा वे करते हैं।

आंदोलन की अगुवाई कर रहे सरवन सिंह पंधेर और जगजीत डल्लेवाल के 29 फरवरी तक दिल्ली कूच टालने के बाद शंभू बॉर्डर पर खनौरी के मुकाबले ज्यादा शांति नजर आती है। 29 फरवरी की मीटिंग में आगे का फैसला लिया जाएगा। इससे पहले दैनिक भास्कर के रिपोर्टर रिंकू नरवाल ने शंभू पहुंचकर हालात का जायजा लिया और वहां डटे किसानों से बातचीत की।

शंभू बॉर्डर पर पंजाब वाली साइड किसानों ने पुलिस की रबर बुलेट्स से बचने के लिए मिट्टी के कट्टे लगाकर छोटे-छोटे मोर्चे बना लिए हैं। उनकी एक्टिविटी यहां दिनभर चलती रहती है। सामने हरियाणा वाली साइड पुलिस और पैरामिलिट्री के जवान पुख्ता बंदोबस्त के साथ डटे हैं।

बठिंडा से पहुंचे हरविंद्र सिंह ने कहा कि जरूरत पड़ी तो 29 को हम गांवों से अपनी गायें और दूसरे पशु बॉर्डर पर लेकर आएंगे। उसके बाद देखेंगे कि गौरक्षा का दम भरने वाली हरियाणा की BJP सरकार गायों पर भी गोलियां चलाती है या नहीं? अगर हरियाणा पुलिस ने गायों पर गोलियां चलाई तो मनोहर सरकार की गौवंश पर की जाने वाली राजनीति बेनकाब हो जाएगी।

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