दिल्ली में आज यमुना नदी के पानी के बंटवारे को लेकर हरियाणा और राजस्थान के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर होने जा रहे हैं. इसके साथ ही 32 साल पहले, यानी 1994 में हुए यमुना जल समझौते को अब धरातल पर उतारने की तैयारी पूरी हो गई है. इस नए कदम से जहां राजस्थान को उसके हिस्से का पानी मिलने का रास्ता साफ होगा, वहीं हरियाणा के कुछ इलाकों में भूजल स्तर को लेकर नई चिंताएं भी पैदा हो गई हैं.
राजस्थान की प्यास बुझाने के लिए हथिनीकुंड बैराज से लेकर राजस्थान की सीमा तक करीब तीन सौ किलोमीटर लंबी एक भूमिगत पाइपलाइन बिछाई जाएगी. इस पूरी परियोजना पर लगभग 3900 करोड़ रुपये का भारी-भरकम खर्च आने का अनुमान है. आज होने वाले समझौते में जमीन के अधिग्रहण, पाइपलाइन के निर्माण कार्य, इसकी नियमित निगरानी और भविष्य में इसके रखरखाव के खर्च को लेकर दोनों राज्यों की जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से तय की जाएंगी. राजस्थान के शेखावाटी इलाके के लोग लंबे समय से इस पानी की राह देख रहे थे, क्योंकि वहां भूजल का अत्यधिक दोहन हो चुका है और जल स्रोत सूखने की कगार पर हैं.
नए समझौते के प्रावधानों के अनुसार, राजस्थान को यमुना से 33,379 क्यूसेक पानी दिया जाना तय हुआ है. हालांकि, यह आपूर्ति केवल जुलाई से अक्टूबर के मानसून वाले महीनों के बीच ही की जाएगी. जल क्षेत्र के विशेषज्ञों ने इस पर व्यावहारिक चिंता जताते हुए कहा है कि यमुना नदी में क्षमता से अधिक पानी साल भर में मुश्किल से पच्चीस से तीस दिन ही रहता है. ऐसे में राजस्थान को पूरे चार महीने तक लगातार और नियमित रूप से यह पानी मिल पाना जमीनी स्तर पर काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है.

इस पूरी कवायद का एक दूसरा पहलू भी है, जो हरियाणा के लिए चिंता का विषय बन सकता है. सिंचाई विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारियों और यमुना संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून के दौरान यमुना का जो अतिरिक्त पानी अब तक हरियाणा की जमीन में रिसकर भूजल को रिचार्ज करता था, वह अब पाइपलाइन के जरिए राजस्थान मोड़ दिया जाएगा. इससे यमुनानगर, करनाल, पानीपत, सोनीपत, फरीदाबाद और पलवल जिलों में प्राकृतिक वाटर रिचार्ज की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. विशेषज्ञों का यह भी तर्क है कि हरियाणा खुद पानी की किल्लत से जूझ रहा है, इसलिए इस अतिरिक्त जल का इस्तेमाल राज्य के अपने सूखे दक्षिणी हिस्सों के लिए किया जा सकता था.
साल 1994 में हुए ऐतिहासिक समझौते में यमुना के पानी का बंटवारा सभी संबंधित राज्यों की जरूरतों के हिसाब से तय किया गया था. उस करार के तहत हरियाणा को सबसे ज्यादा 40.6 प्रतिशत हिस्सा मिला था. इसके अलावा उत्तर प्रदेश को 35.1 प्रतिशत, राजस्थान को 10.4 प्रतिशत, दिल्ली को 6.3 प्रतिशत और हिमाचल प्रदेश को 1.7 प्रतिशत पानी दिया जाना तय हुआ था. हालांकि, अब इस नए एमओयू को लेकर हरियाणा में राजनीति भी गरमा गई है. विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार को अपना पानी राजस्थान को देने से पहले, एसवाईएल (SYL) के जरिए पंजाब से अपने हिस्से का पूरा पानी हासिल करने पर जोर देना चाहिए. कई नेता ऐसे भी हैं जो शुरुआत से ही 1994 के इस समझौते का विरोध करते रहे हैं और आज भी इसे हरियाणा के हितों के खिलाफ बता रहे हैं.
