हमारे देश की लड़कियां क्यों सुरक्षित नहीं है। हर तरफ रेप और यौन शोषण के मामले सामने आ रहे हैं। अब तो हवस के शिकारी मासूम बच्चियों को भी नहीं छोड़ रहे हैं। अस्पताल, गली, मोहल्ला और अब तो स्कूल में भी बच्चियां शोषण का शिकार हो रही है। कोलकाता कांड के बाद महाराष्ट्र की घटना से सभी को हिला कर रख दिया है। हैरानी की बात तो यह है कि बहुत से लोग बाल यौन शोषण के खिलाफ बनाए गए कानून से आज भी अनजान हैं

महाराष्ट्र के ठाणे जिला स्थित एक स्कूल के शौचालय में चार वर्षीय दो बच्चियों से सफाईकर्मी द्वारा कथित यौन उत्पीड़न किया गया। इस घटना के बाद , हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारियों ने  बदलापुर रेलवे स्टेशन की पटरियों को अवरुद्ध कर दिया और विद्यालय परिसर में धावा बोल दिया। आक्रोशित अभिभावकों सहित सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने बच्चियों के यौन उत्पीड़न के खिलाफ अपनी नाराजगी जताने के लिए स्कूल भवन में तोड़फोड़ की।

भारत में बच्चियों के यौन शोषण को लेकर कठोर कानून बनाए गए हैं, जो उनकी सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक हैं। ये कानून न केवल अपराधियों को सजा देने के लिए हैं, बल्कि पीड़ितों को न्याय और सहायता प्रदान करने के लिए भी बनाए गए हैं। प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस (POCSO) एक्ट 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों को कवर करता है। इसमें यौन उत्पीड़न, यौन शोषण, और पोर्नोग्राफी जैसे अपराधों के लिए कठोर सजा का प्रावधान है।   कानून में नाबालिगों के खिलाफ अपराधों की जांच के लिए विशेष अदालतों की स्थापना का भी प्रावधान है, ताकि त्वरित और निष्पक्ष न्याय मिल सके। इस कानून के तहत अपराधी को न्यूनतम 7 साल की सजा से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है, और साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

यह धारा बलात्कार के मामलों से संबंधित है और इसमें दोषी को 7 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। अगर पीड़िता नाबालिग है, तो सजा और भी कठोर हो जाती है। यह धारा महिला के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाले अपराधों (जैसे कि छेड़छाड़) के लिए है। इसमें दोषी को 1 से 5 साल तक की सजा हो सकती है।   यह धारा महिलाओं को अपमानित करने के लिए शब्दों, इशारों या कार्यों का उपयोग करने के लिए सजा का प्रावधान करती है।

यह कानून बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा और उनकी देखभाल के लिए है। इसमें बाल अपराधियों के लिए पुनर्वास और सुधार के उपाय भी शामिल हैं। 2015 के संशोधन में गंभीर अपराधों के लिए 16 से 18 वर्ष की आयु के नाबालिगों को वयस्कों की तरह सजा देने का प्रावधान भी शामिल किया गया है।

बच्चों के यौन शोषण के मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष ई-कोर्ट्स की स्थापना की गई है।

भारत में बच्चियों के यौन शोषण के खिलाफ कड़े कानून बनाए गए हैं। इन कानूनों का उद्देश्य अपराधियों को सजा दिलाने के साथ-साथ पीड़ितों को सुरक्षा और न्याय प्रदान करना है। यह आवश्यक है कि समाज के सभी वर्ग इन कानूनों के बारे में जागरूक हों और उनका पालन करें, ताकि बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके

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