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हरियाणा में हजारों पुरुष धड़ल्ले से रखें बैठे हैं दो बीवियां,  तीन पत्नियों वालों की लिस्ट भी है लंबी

हरियाणा में परिवार पहचान पत्र (पीपीपी) डेटा सिस्टम से एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है, रिकॉर्ड बताते हैं कि प्रदेश में ऐसे 2779 पुरुष हैं, जिनकी दो या अधिक पत्नियां हैं, इतना ही नहीं 15 ऐसे व्यक्ति भी हैं जिनकी 3 तीन पत्नियां हैं।  हरियाणा सहित भारत के अधिकतर राज्यों में हिंदू पुरुषों के लिए दो शादियां करना अवैध है। यह नियम हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) के तहत लागू होता है

परिवार पहचान प्राधिकरण के मुताबिक प्रदेश में ऐसे 2779 पुरुष हैं, जिन्होंने अपनी फैमिली आईडी में दो या अधिक पत्तियों और उनके बच्चों की जानकारी दर्ज करवाई है। परिवार पहचान प्राधिकरण के मुताबिक, 2761 व्यक्तियों ने दो पत्नियों की जानकारी दी है। 15 व्यक्तियों ने बताया है कि उनकी तीन पत्नियां हैं। सबसे ज्यादा मामले नूंह जिले से सामने आए हैं। 
 

आंकड़ों के मुताबिक हरियाणा के नूंह में सबसे ज्यादा 353 लोगों की दो पत्नियां हैं, जबकि फरीदाबाद में 267, पलवल में 178, करनाल में 171, गुरुग्राम में 157, हिसार में 152, जींद में 147 सोनीपत में 134, पानीपत में 129, सिरसा में 130, यमुनानगर में 111, कुरुक्षेत्र में 96, फतेहाबाद में 104, कैथल में 92, अंबाला में 87, महेंद्रगढ़ में 81, रेवाड़ी में 80, रोहतक में 78, झज्जर में 72, भिवानी में 69, पंचकूला में 44 और चरखी दादरी में 30 व्यक्तियों की दो पत्नियां हैं

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 के तहत, विवाह का एक प्रमुख शर्त यह है कि विवाह के समय दोनों पक्षों में से कोई भी पहले से विवाहित नहीं होना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति अपनी पहली पत्नी के रहते हुए दूसरी शादी करता है, तो यह दंडनीय अपराध है और इसे बिगैमी (Bigamy)कहा जाता है। यह भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 494 और 495 के अंतर्गत आता है। दोषी पाए जाने पर 7 साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है।

 ये व्यवस्था कानूनी रूप से वैध नहीं  है, लेकिन परिवारिक सहमति, सामाजिक दबाव और मध्यस्थता के माध्यम से बनाई गई है। भले ही पत्नी खुद दूसरी पत्नी को स्वीकार कर ले, लेकिन कानूनन वह विवाह अवैध माना जाएगा। पहली पत्नी चाहे तो कानूनी शिकायत दर्ज कर सकती है। कुछ मामले में पत्नी ने तलाक या गुज़ारा भत्ता के लिए केस भी दर्ज किए हैं। हाल के मामलों में दिखा है कि कुछ लोग सामाजिक या पारिवारिक समझौते  से इसे स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन यह कोई कानूनी अधिकार नहीं देता।

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