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Shivratri Special: उत्तराखंड का सबसे खूबसूरत मंदिर केदारनाथ जहां पर पांडवों को मिली थी पाप से मुक्ति

ये बात बताने की जरुरत नहीं हैं कि केदारनाथ मंदिर हिंदुओं का सबसे बड़ा धाम है और हर शिव भक्त यहां पर दर्शन के लिए जिंदगी में एक बार तो जरुर आता है। महाशिवरात्रि इस साल 18 फरवरी को है तो चलिए इस मौके पर जानते हैं केदारनाथ मंदिर के बारे में ज्यादा करीब से और साथ ही इस खूबसूरत धाम से जुड़ी रोचक कहानी…

देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में केदारनाथ धाम ज्यादा ऊंचाई पर बसा है। ये धाम मंदाकिनी नदी के किनारे 3581 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। ये उत्तराखंड का सबसे विशाल शिव मंदिर है, जो पत्थरों के शिलाखंडों को जोड़कर बनाया है। ये ज्योतिर्लिंग त्रिकोण आकार का है और इसकी स्थापना के बारे में कहा जाता है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भोलेनाथ प्रकट हुए और उन्हें ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वरदान दिया।

ये मन्दिर एक छह फीट ऊंचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है। मंदिर में मुख्य भाग मंडप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। बाहर प्रांगण में नंदी बैल वाहन के रूप में विराजमान है। मन्दिर का निर्माण किसने कराया, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन ऐसा कहा जाता है कि इसकी स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी। आपको बता दें कि केदारनाथ पहुंचने के लिए गौरीकुण्ड से 15 किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी पड़ती है। बाबा केदार का ये धाम कात्युहरी शैली में बना हुआ है। इसके निर्माण में भूरे रंग के बड़े पत्थरों का प्रयोग बहुत ज्यादा किया गया है। मंदिर की छत लकड़ी की बनी हुई है, जिसके शिखर पर सोने का कलश है। केदारनाथ मंदिर को तीन भागों में बांटा गया है- गर्भगृह, दूसरा-दर्शन मंडप (जहां पर दर्शनार्थी एक बड़े प्रांगण में खड़े होकर पूजा करते हैं) और तीसरा- सभा मंडप (इस जगह पर सभी तीर्थ यात्री जमा होते हैं ।) 

भगवान केदारनाथ के दर्शन के लिए ये मंदिर केवल 6 महीने ही खुलता है और 6 महीने बंद रहता है। ये मंदिर वैशाखी के बाद खोला जाता है और दीपवाली के बाद पड़वा को बंद किया जाता है। जब 6 महीने का समय पूरा होता है तो मंदिर के पुजारी इस मंदिर में एक दीपक जलात हैं, जो कि अगले 6 महीने तक जलता रहता है और 6 महीने बाद जब ये मंदिर खोला जाता है तब ये दीपक जलता हुआ मिलता है।

ऐसी मान्यता है कि द्वापर काल में जब पांडवों ने महाभारत का युद्ध जीत लिया था, तब उन्हें इस बात की ग्लानि हो रही थी कि उन्होनें अपने भाइयों, सगे-संबंधियों का वध किया है। उन्होनें बहुत पाप किया है, इसे लेकर वो बहुत दुखी रहा करते थे। इन पापों से मुक्ति के लिए पांडवों ने भगवान शिव के दर्शन के लिए काशी पहुंचे। लेकिन इस बात का पता जब भोलेनाथ को पता चला तो नो नाराज होकर केदारनाथ चले गए। फिर पांडव भी भोलेनाथ के पीछे-पीछे केदारनाथ पहुंच गए। फिर शिव जी ने पांडवों से बचने के लिए बैल का रूप धारण किया और बैल की झुंड में शामिल हो गए। तब भीम ने अपना विराट रूप धारण कर पहाड़ों पर अपना पैर रखकर खड़े हो गए। सभी पशु भीम के पैरों के नीचे से चले गए, परंतु भगवान शिव अंतर्ध्यान (गायब) होने ही वाले थे कि भीम ने भोलेनाथ की पीठ पकड़ ली। पांडवों की इस लालसा को देखकर शिव जी बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें दर्शन दिए। इसके बाद पांडव इस पाप से मुक्त हुए। इस घटना के बाद पांडवों ने यहां पर केदरानाथ मंदुर का निर्माण करवाया था, जिसमें आज भी बैल के पीठ की आकृति-पिंड के रूप में पूजा की जाती है।

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