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मुश्किल समय में भी धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए, अच्छी किताबें पढ़ने से बना रहता है धैर्य : पं. जवाहरलाल नेहरू

आज (14 नवंबर) भारत के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन है। नेहरू जी के जीवन के कई ऐसे किस्से हैं, जिनमें सुखी और सफल जीवन के सूत्र छिपे हैं। अगर इन सूत्रों को जीवन में उतार लिया जाए तो हमारी कई समस्याएं आसानी से खत्म हो सकती हैं। यहां जानिए एक ऐसा किस्सा, जिसमें नेहरू जी ने धैर्य बनाए रखने की सीख दी है।

चर्चित किस्से के मुताबिक एक बार नेहरू जी हवाई जहाज से यात्रा कर रहे थे। उस समय यात्रा के बीच में हवाई जहाज में आग लग गई। सभी यात्रियों के साथ स्टाफ और पायलट भी घबरा गए।

हवाई जहाज के स्टाफ के कुछ लोग नेहरू जी के पास पहुंचे और उन्हें पूरी बात बताई। स्टाफ ने कहा कि बहुत बड़ा संकट आ गया है, अब हमें समझ नहीं आ रहा कि हम क्या करें?

नेहरू जी बोले कि आप सब डरिए नहीं। डरने की जरूरत भी नहीं है, जो होना है, वह तो होगा ही। इस समय आप लोगों को अपनी ऊर्जा डरने में नहीं, बल्कि कोशिश करने में लगानी चाहिए। अभी सारी बातें छोड़कर धैर्य बनाए रखें और अपना श्रेष्ठ करें।

इतना बोलकर नेहरू जी किताब पढ़ने लगे। नेहरू जी से बात करने के बाद पायलट जहाज को बचाने की कोशिश में लग गए। बहुत कोशिशों के बाद पायलट ने जलते हुए जहाज को एक खेत में उतार दिया। सभी यात्रियों को तुरंत ही जहाज से सुरक्षित निकाल लिया गया।

जब सभी लोगों के साथ नेहरू जी भी बाहर आए तो उनके चेहरे पर वही सहजता थी, जो जलते हुए जहाज के अंदर थी।

नेहरू जी ने इस किस्से में हमें सीख दी है कि किसी भी स्थिति में धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। जब परिस्थितियां विपरीत हों तो धैर्य छोड़ना ही नहीं चाहिए। धैर्य बना रहेगा तो हालात को जल्दी ही काबू किया जा सकता है और मुश्किलों को दूर किया जा सकता है।

धैर्य बना रहे इसके लिए हमें कोई अच्छी किताब पढ़नी चाहिए। हमें ऐसे काम करें, जिनसे हम दूसरों की हिम्मत बढ़ा सके।

जैसा हम कहते हैं, वैसे ही हमारे कर्म भी होने चाहिए

नेहरू जी के बचपन का एक किस्सा है। नेहरू जी के पिता मोतीलाल नेहरू स्वभाव से बहुत सख्त और अनुशासन प्रिय थे। मोतीलाल जी आजादी की लड़ाई में भी भाग ले रहे थे। उस समय जवाहर की उम्र काफी कम थी। जवाहर पर अपने पिता के स्वभाव का गहरा असर था।

जवाहर अक्सर देखते थे कि मेरे पिता भारत को आजाद कराने के लिए लगातार कोशिश कर रहे हैं। उन दिनों मोतीलाल जी ने अपने घर में एक तोता पाल रखा था। वह तोता मोलीलाल जी को बहुत प्रिय था।

एक दिन जब वे बाहर से घर आए तो उन्होंने देखा कि पिंजरा खाली है, उसमें तोता नहीं है। बाद में उन्हें मालूम हुआ कि तोते को जवाहर ने उड़ा दिया है।

मोतीलाल जी ने जवाहर से पूछा कि तुमने तोते को क्यों उड़ा दिया?

जवाहर पिता के सामने डरे हुए थे, उन्होंने हिम्मत करके कहा कि आप बातें तो आजादी की करते हैं, लेकिन आपने एक तोते को गुलाम बना रखा है। मैंने आपकी बातों से प्रभावित होकर तोते को आजाद कर दिया। ये बात सुनते ही मोतीलाल जी समझ गए कि जवाहर ने सही काम किया है। उन्होंने कहा कि हम जैसा कहते हैं, हमारा स्वभाव भी वैसा ही होना चाहिए।

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