हरियाणा के करनाल जिले के गांव सेखपुरा मंचूरी में रविवार को उस समय हर आंख नम हो गई, जब 11 दिन बाद अमेरिका से 24 वर्षीय सुपनदीप सिंह का शव गांव पहुंचा। बेटे का पार्थिव शरीर देखते ही मां बेसुध हो गई और बार-बार कहती रही, “मेरा बेटा उठ जाएगा… कोई एक बार उससे बात तो करा दो।” वहीं, भाई के अंतिम दर्शन करते ही बहन भी बदहवास हो गई। पूरे गांव में मातम का माहौल रहा और अंतिम दर्शन के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी।
सुपनदीप की 16 जून को अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित सैक्रामेंटो शहर में हार्ट अटैक से मौत हो गई थी। वह नाइट शिफ्ट खत्म कर अपने कमरे पर लौटा था। अगले दिन जब देर तक कमरे का दरवाजा नहीं खुला तो साथ रहने वाले दोस्तों ने दरवाजा तोड़ा। अंदर सुपनदीप अचेत अवस्था में मिला। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। प्रारंभिक जांच में मौत का कारण हार्ट अटैक बताया गया।
बेहतर भविष्य के लिए विदेश गया था
सुपनदीप के चाचा गुरदेव सिंह ने बताया कि करीब दो साल पहले परिवार ने बेहतर भविष्य की उम्मीद में उसे पहले कनाडा भेजा था। इसके लिए परिवार ने अपनी करीब 2 एकड़ जमीन बेच दी थी। कनाडा में मनचाहा काम और आय नहीं मिलने पर वह डंकी रूट के जरिए अमेरिका पहुंच गया, जहां वह सैक्रामेंटो में एक स्टोर पर नौकरी कर रहा था।
मौत से दो दिन पहले किया था वादा
परिजनों के मुताबिक, सुपनदीप के पिता का करीब नौ साल पहले निधन हो चुका था। घर में मां और शादीशुदा बड़ी बहन हैं। मौत से महज दो दिन पहले सुपनदीप ने फोन पर परिवार से बात करते हुए कहा था कि “मैं जल्द ही घर का सारा कर्ज उतार दूंगा और जो जमीन बिकी है, उसे भी वापस खरीद लेंगे।” लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
शव लाने में लगे करीब 25 लाख रुपए
अमेरिका से शव भारत लाना परिवार के लिए बेहद मुश्किल साबित हुआ। परिजनों ने विदेश मंत्रालय और भारतीय समुदाय से मदद की अपील की। अमेरिका में रह रहे भारतीयों ने चंदा इकट्ठा कर आर्थिक सहयोग दिया। करीब 25 लाख रुपये की लागत के बाद 11 दिन बाद सुपनदीप का पार्थिव शरीर दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचा, जहां से एम्बुलेंस के जरिए उसे गांव लाया गया।
चाचा ने दी मुखाग्नि
रविवार को गांव में पूरे सम्मान के साथ सुपनदीप का अंतिम संस्कार किया गया। पिता के निधन के कारण चाचा गुरदेव सिंह ने उसे मुखाग्नि दी। अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए और पूरे गांव ने नम आंखों से उसे अंतिम विदाई दी।
यह घटना एक बार फिर उन परिवारों की पीड़ा को सामने लाती है, जो बेहतर भविष्य की उम्मीद में अपनी जमीन-जायदाद तक बेचकर बच्चों को विदेश भेजते हैं। कई सपने पूरे हो जाते हैं, लेकिन कुछ परिवारों के हिस्से में सिर्फ इंतजार और अपनों की यादें रह जाती हैं।

