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काशी में मनाई जाती है मसान होली, जानिए इस अनोखी परंपरा के बारे मे

फाल्गुन पूर्णिमा के दिन देश भर में होली का त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता है। होली का यह त्यौहार रंगों, अबीर-गुलाल और फूलों से खेलकर मनाया जाता है। लेकिन काशी की मसाने की होली (Masane Ki Holi) एक ऐसी होली परंपरा है, जो पूरी दुनिया में अपनी अनोखी और रहस्यमयी विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध है।

काशी में रंगभरी एकादशी के बाद मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर जलती हुई चिताओं के बीच होली खेली जाती है। इसे “मसान होली” या “मसाने की होली” कहा जाता है। इस दौरान साधु-संत और शिव भक्त भगवान शिव की पूजा करके होली खेलते हैं।

माना जाता है कि काशी की मसान होली की शुरुआत भगवान शिव से जुड़ी एक कथा से हुई थी। यह परंपरा रंगभरी एकादशी के अगले दिन से शुरू होती है। काशी में होली का उत्सव रंगभरी एकादशी के दिन से शुरू होकर अगले छह दिनों तक चलता है। कहानी के अनुसार, भगवान शिव रंगभरी एकादशी के दिन देवी गौरी का गौना कराकर उनके साथ काशी पहुंचे थे। काशी में भगवान शिव के गणों ने उनका स्वागत गुलाल और अबीर के साथ होली खेलकर किया था। हालांकि, भगवान शिव और उनके गणों को भूत-प्रेत, यक्ष, गंधर्व और प्रेत आदि के साथ होली खेलने का अवसर नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने अगले दिन यानी मसान होली के दिन अपने गणों के साथ होली खेली।

काशी में मसान होली की विशेषता यह है कि यह पूरी दुनिया में एकमात्र ऐसी होली है, जो महाश्मशान में चिता की राख से खेली जाती है। मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर जलती हुई चिताओं के बीच, भक्त भगवान शिव के स्वरूप मसान नाथ के विग्रह पर गुलाल और चिता की राख चढ़ाकर होली की शुरुआत करते हैं। यह होली एक अद्वितीय धार्मिक अनुभव प्रदान करती है और काशी की विशेषता को उजागर करती है। यहाँ के भक्त यह मानते हैं कि मृत्यु और मोक्ष के प्रतीक महाश्मशान में होली खेलना, जीवन और मृत्यु के चक्र को पार करने का एक प्रतीक है।

काशी में होली का उत्सव छह दिन तक चलता है। रंगभरी एकादशी के दिन, काशी के विश्वनाथ मंदिर में बाबा काशी विश्वनाथ और माता पार्वती का विवाह उत्सव मनाया जाता है। इसके बाद, अगले दिन मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर मसान होली का आयोजन होता है।

यह अनोखी परंपरा आज भी काशी के भक्तों द्वारा बड़े श्रद्धा और भक्ति के साथ निभाई जाती है।

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