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रोहतक में मगन सुहाग सुसाइड केस:पत्नी दिव्या को हाईकोर्ट से 9 शर्तों पर मिली जमानत; उल्लंघन करने पर जाएंगी जेल

रोहतक में मगन सुहाग सुसाइड केस में आरोपी पत्नी दिव्या को हाईकोर्ट से राहत मिल गई है। हाई कोर्ट ने 9 शर्तों पर दिव्या को नियमित जमानत दी है। साथ ही निर्देश दिए कि अगर दिव्या निर्देशों का उल्लंघन करती है तो उसकी जमानत को रद्द किया जा सकता है।

गांव डोभ निवासी मगन सुहाग ने 18 जून को फांसी का फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली थी। मरने से पहले मगन ने वीडियो बनाकर अपनी मौत के लिए पत्नी दिव्या व महाराष्ट्र पुलिस के सिपाही दीपक को जिम्मेदार ठहराया था। इस मामले में दिव्या की जमानत याचिका पर रोहतक एडिशनल सेशन कोर्ट में 4, 8, 9,11 व 19 सितंबर को सुनवाई हुई, जिसमें याचिका को खारिज कर दिया गया। अब हाई कोर्ट से जमानत मंजूर हुई है।

हाई कोर्ट ने दिव्या को जमानत देते हुए 9 शर्त निर्धारित की हैं, जिनमें याचिकाकर्ता सुनवाई के दौरान साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा। याचिकाकर्ता अभियोजन पक्ष के गवाहों पर दबाव नहीं डालेगा व उन्हें डराएगा नहीं। याचिकाकर्ता प्रत्येक निर्धारित तिथि पर ट्रायल कोर्ट के समक्ष उपस्थित होगा, जब तक कि उसे न्यायालय के किसी विशिष्ट आदेश द्वारा छूट न दी जाए।

हाई कोर्ट के अनुसार याचिकाकर्ता उस अपराध के समान कोई अपराध नहीं करेगा, जिसका वह आरोपी है या जिसके लिए वह दोषी है। जिस पर उस पर संदेह है। याचिकाकर्ता मामले के तथ्यों से परिचित किसी भी व्यक्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मजबूर, प्रेरित, धमकी या वादा नहीं करेगा, जिससे वह न्यायालय या किसी पुलिस अधिकारी के समक्ष ऐसे तथ्यों का खुलासा करने से विमुख हो जाए या किसी भी तरीके से साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ करे।

हाई कोर्ट के अनुसार याचिकाकर्ता किसी भी तरह से अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं करेगी। याचिकाकर्ता को अपना पता और मोबाइल नंबर एक हलफनामे के माध्यम से ट्रायल कोर्ट को देना होगा और ट्रायल समाप्त होने तक उसमें कोई परिवर्तन नहीं करना होगा। यदि किसी कारणवश वह उपरोक्त में से किसी में भी परिवर्तन करना चाहती है तो ऐसा केवल ट्रायल कोर्ट को पूर्व सूचना देने के बाद ही किया जाएगा।

याचिकाकर्ता को ट्रायल कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ना होगा। ट्रायल कोर्ट व ड्यूटी मजिस्ट्रेट याचिकाकर्ता को रिहा करते समय कोई अन्य शर्त लगा सकता है, जो उचित समझे। हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि उपरोक्त शर्तों का कोई उल्लंघन होता है तो राज्य को इस आदेश द्वारा याचिकाकर्ता को दी गई जमानत को रद्द करने की मांग करने की स्वतंत्रता होगी।

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