समस्त धर्मों के लिए एकता, भाईचारे का प्रतीक, खुशियों भरा, हिंदु संस्कृति परंपरा का पवित्र और नववर्ष का पहला त्यौहार लोहड़ी पर्व सोमवार को माता दरवाजा स्थित संकट मोचन मंदिर में हर्षोल्लास, उत्साह, श्रद्धा और भक्तिभाव से दरिये होए, तेरा कौन बेचारा होए, दुल्ला भट्टी वाला होए, दुल्ले की धी ब्याही होए, कोठे उते हुक्का, ऐ घर भूखा आदि पंजाबी लोक गीतों, बैंड-बाजों की धून के साथ, गिद्दा और भांगड़ा की थाप पर भक्तजन झूमते-नाचते दिखाई दिए।
ब्रह्मलीन गुरुमां गायत्री जी की कृपा से गद्दीनशीन साध्वी मानेश्वरी देवी और भक्तजनों ने अग्रि जलाकर अग्रि पूजन की परिक्रमा की और तिल, गुड़, चावल, और भूना हुआ मक्का की आहूति डाली और अग्रि देव से मनोकामनाएं मांगी। कार्यक्रम में साध्वी मानेश्वरी देवी के प्रवचन हुए। पंडित अशोक शर्मा ने मूंगफली, रेवड़ी व मक्का का प्रसाद बांटा
परमश्रद्धेया मानेश्वरी देवी जी ने भक्तों को प्रवचन देते हुए कहा कि यह त्यौहार मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व मनाया जाता है। यह पर्व पौष माह का अंत और माघ माह की शुरुआत मानी जाती है।
लोहड़ी शब्द तीन अक्षरों से मिलकर बना है ल से लकड़ी, ओह से गोहा यानि जलते हुए उपले व डी से रेवड़ी। लोहड़ी को लाल लाही, लोहिता व खिचड़वार नाम से भी जाना है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को सदैव अपनी मुख की वाणी मधुर व विचार शुद्ध रखने चाहिए। सत्संग का मतलब सत्य का संग आपके जीवन में यदि संग भी करने का भाव हो तो अच्छे लोगों का संग करना चाहिए। अच्छी संगत ही अच्छे मार्ग पर ले जा सकती है। हमें कल की चिंता छोड़ देनी चाहिए। अच्छे कर्म करेंगे तो ही सुख प्राप्त होगा। सुख और दुख दोनों आते जाते हैं, उससे विचलित नहीं होना चाहिए।

