इस बार भाई दूज का शुभ मुहूर्त 26 अक्टूबर बुधवार को दोपहर 2:43 मिनट के बाद होगा ।। क्योंकि शास्त्रों में भोजन का समय दोपहर का बताया गया है ।। यम और चित्रगुप्त का पूजन अर्घ्य इत्यादि भी दोपहर में ही होता है इसीलिए शास्त्रों के अनुसार भाई दूज बुधवार दोपहर में ही मनाना चाहिए ।। किंतु उतरी भारत में अधिकांश लोग हर त्यौहार को उदय तिथि के साथ ही जोड़ लेते हैं, यद्यपि यह शास्त्र अनुमोदित नही है ।। परंतु आज के वातावरण को देखते हुए जो लोग 26 को ना मना पाए, वे 27 को प्रातः 12:46 से पहले यह त्यौहार मना ले ।।
भाईदूज का इतिहास, इस दिन भाई को यमपाश से कैसे छुड़ाये ?
यमराज, यमुना, तापी और शनि ये भगवान सूर्य की संताने कही जाती हैं ।। किसी कारण से यमराज अपनी बहन यमुना से वर्षों दूर रहे ।। एक बार यमराज के मन में हुआ कि ‘बहन यमुना को देखे हुए बहुत वर्ष हो गये हैं ।।’ अतः उन्होंने अपने दूतों को आज्ञा दीः “जाओ जा कर जाँच करो कि यमुना आजकल कहाँ स्थित है ।।”
यमदूत विचरण करते-करते धरती पर आये तो सही किंतु उन्हें कहीं यमुना जी का पता नहीं लगा ।। फिर यमराज स्वयं विचरण करते हुए मथुरा आये और विश्रामघाट पर बने हुए यमुना के महल में पहुँचे ।।
बहुत वर्षों के बाद अपने भाई को पाकर बहन यमुना ने बड़े प्रेम से यमराज का स्वागत-सत्कार किया और यमराज ने भी उसकी सेवा सुश्रुषा के लिए याचना करते हुए कहाः “बहन ! तू क्या चाहती है ? मुझे अपनी प्रिय बहन की सेवा का मौका चाहिए ।।”
यमुना जी ने कहाः ”भैया ! आज नववर्ष की द्वितीया है ।। आज के दिन भाई बहन के यहाँ आये और जो कोई भाई बहन से स्नेह से मिले और बहन अपने भाई को घर पर भोजन करावे, उस बहन के भाई को और पति को यमपुरी के पाश से मुक्त करने का वचन को तुम दे सकते हो ।।”
यमराज प्रसन्न हुए और बोलेः “बहन ! ऐसा ही होगा ।।”
पौराणिक दृष्टि से आज भी लोग बहन यमुना और भाई यम के इस शुभ प्रसंग का स्मरण करके आशीर्वाद पाते हैं व यम के पाश से छूटने का संकल्प करते हैं ।।
यह पर्व भाई-बहन के स्नेह का द्योतक है ।। कोई बहन नहीं चाहती कि उसका भाई दीन – हीन, तुच्छ हो, सामान्य जीवन जीने वाला हो, ज्ञानरहित, प्रभाव रहित हो ।। इस दिन भाई को अपने घर पाकर बहन अत्यन्त प्रसन्न होती है ।।
बहन भाई को इस शुभ भाव से तिलक करती है कि ‘मेरा भैया त्रिनेत्र बने ।। बहन तिलक करके अपने भाई को प्रेम से भोजन कराती है और बदले में भाई उसको वस्त्र – अलंकार, दक्षिणा आदि देता है ।। बहन निश्चिंत होती है कि ‘मैं अकेली नहीं हूँ, मेरे साथ मेरा भैया है ।।’
दीपावली के तीसरे दिन आने वाला भाईदूज का यह पर्व, भाई की बहन के संरक्षण की याद दिलाने वाला और बहन द्वारा भाई के लिए शुभ कामनाएँ करने का पर्व है ।।
इस दिन बहन को चाहिए कि अपने भाई की दीर्घायु के लिए यमराज से अर्चना करे और इन अष्ट चिरंजीवीयों के नामों का स्मरण करे :- मार्कण्डेय, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा और परशुराम ।। ‘मेरा भाई चिरंजीवी हो’ ऐसी उनसे प्रार्थना करे तथा मार्कण्डेय जी से इस प्रकार प्रार्थना करेः
‘हे महाभाग मार्कण्डेय ! आप सात कल्पों के अन्त तक जीने वाले चिरंजीवी हैं ।। जैसे आप चिरंजीवी हैं, वैसे मेरा भाई भी दीर्घायु हो ।।’ (पद्मपुराण)
इस प्रकार भाई के लिए मंगल कामना करने का तथा भाई-बहन के पवित्र स्नेह का पर्व है भाईदूज ।।
वासुदेव ज्योतिष अनुसंधान केंद्र
पं अनुराग शास्त्री
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