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हरियाणा के सरकारी अस्पतालों में शवगृह बदहाल, मानवाधिकार आयोग सख्त: सभी फ्रीजर हर समय चालू रखने के आदेश, मृतकों की गरिमा से समझौता नहीं

पंचकूला, 16 जुलाई। हरियाणा मानवाधिकार आयोग (HHRC) ने प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में शवगृह (मॉर्च्युरी) की बदहाल व्यवस्थाओं पर सख्त रुख अपनाते हुए सभी सरकारी अस्पतालों को निर्देश जारी किए हैं कि शव संरक्षण के लिए लगाए गए फ्रीजर चैंबरों का नियमित निरीक्षण किया जाए और उन्हें हर समय कार्यशील रखा जाए। आयोग ने स्पष्ट किया है कि मृतकों की गरिमा और सम्मान के साथ किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।यह निर्देश आयोग के सदस्य दीप भाटिया ने सोनीपत और फरीदाबाद से जुड़े दो अलग-अलग मामलों की सुनवाई के दौरान दिए। दोनों मामलों में सामने आई खामियों के बाद आयोग ने राज्यभर के अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों को भी शवगृह व्यवस्थाओं की नियमित निगरानी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।सोनीपत मामले में पानीपत निवासी जोगेन्द्र सिंह ने आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी कि उनके 30 वर्षीय पुत्र विकास की जुलाई 2024 में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई थी। पोस्टमार्टम के लिए शव को सिविल अस्पताल, सोनीपत भेजा गया, जहां शव को सुरक्षित रखने और पहचान प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए गए। शिकायत में कहा गया कि पर्याप्त और कार्यशील फ्रीजर उपलब्ध नहीं होने के कारण शव संरक्षण प्रभावित हुआ, जिससे परिवार को मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ा। सुनवाई के दौरान सिविल सर्जन द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में बताया गया कि सिविल अस्पताल, सोनीपत के शवगृह में 8 डीप फ्रीजर उपलब्ध हैं। इसके अलावा बीपीएस राजकीय महिला मेडिकल कॉलेज, खानपुर कलां में भी मॉर्च्युरी चैंबर की सुविधा उपलब्ध है।वहीं फरीदाबाद के बीके सिविल अस्पताल की रिपोर्ट में बताया गया कि अस्पताल में कुल 14 डेड बॉडी फ्रीजर चैंबर हैं, जिनमें से केवल 10 कार्यशील पाए गए, जबकि 4 फ्रीजर अस्थायी रूप से बंद थे। अस्पताल में प्रतिदिन औसतन 5 से 10 पोस्टमार्टम किए जाते हैं।हरियाणा मानवाधिकार आयोग के असिस्टेंट रजिस्ट्रार डॉ. पुनीत अरोड़ा ने बताया कि दोनों मामलों की रिपोर्ट का परीक्षण करने के बाद संबंधित मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि शवगृहों के सभी फ्रीजर चैंबरों की नियमित जांच की जाए और उन्हें हर समय चालू रखा जाए। आयोग ने कहा कि मृतकों के शवों का सम्मानजनक संरक्षण सुनिश्चित करना स्वास्थ्य संस्थानों की कानूनी और मानवीय जिम्मेदारी है तथा इस संबंध में किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।

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