661 करोड़ रुपए के बहुचर्चित IDFC-AU स्मॉल फाइनेंस बैंक घोटाले में गिरफ्तार पूर्व नगर निगम आयुक्त एवं IAS अधिकारी राम कुमार सिंह और विकास एवं पंचायत विभाग के पूर्व अधीक्षक प्रिंस शर्मा को सोमवार को पंचकूला कोर्ट में पेश किया गया। सुनवाई के बाद अदालत ने दोनों आरोपियों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
कोर्ट में पेशी के दौरान केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने दावा किया कि IAS अधिकारी राम कुमार सिंह ने गिरफ्तारी से पहले बैंक घोटाले के कथित मास्टरमाइंड के साथ हुई अपनी चैटिंग डिलीट कर दी थी। एजेंसी ने इसे जांच के लिए महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य बताया।
जांच निर्णायक चरण में, कई पहलुओं की पड़ताल जारी
सीबीआई ने अदालत को बताया कि हरियाणा सरकार और केंद्र सरकार की मंजूरी मिलने के बाद पंचकूला एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) में दर्ज एफआईआर को अपने हाथ में लिया गया था। मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत जांच की जा रही है।
एजेंसी के अनुसार 21 मई 2026 को 13 आरोपियों के खिलाफ अंतिम रिपोर्ट दाखिल की गई थी। इसके बाद 12 जून को दाखिल पूरक रिपोर्ट में विक्रम वाधवा और राजन सिंह को भी आरोपी बनाया गया। हालांकि अन्य विभागों, बैंक अधिकारियों और संदिग्ध व्यक्तियों की भूमिका की जांच अभी जारी है।
पूछताछ में सामने आई दोनों अधिकारियों की भूमिका
सीबीआई के मुताबिक राम कुमार सिंह की भूमिका उस समय सामने आई जब वह नगर निगम पंचकूला और नगर परिषद कालका में आयुक्त के पद पर कार्यरत थे। वहीं प्रिंस शर्मा की भूमिका विकास एवं पंचायत विभाग में तैनाती के दौरान उजागर हुई।
दोनों आरोपियों को 18 जून को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद अदालत से रिमांड लेकर उनसे विस्तृत पूछताछ की गई और डिजिटल तथा दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर कई सवाल किए गए।
इन बिंदुओं पर हुई पूछताछ
सीबीआई ने पूछताछ के दौरान दोनों आरोपियों से IDFC बैंक की सेक्टर-32 शाखा में नए खाते खुलवाने, फिक्स्ड डिपॉजिट के लिए कोटेशन मंगवाने, बैंक खातों से जुड़े एसएमएस, संदिग्ध लेन-देन और बैंक स्टेटमेंट्स के बारे में सवाल किए।
इसके अलावा एजेंसी ने यह भी जानने की कोशिश की कि कथित धोखाधड़ी की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने क्या कदम उठाए, अवैध रूप से अर्जित धनराशि कहां रखी गई, सह-आरोपियों के साथ उनकी क्या बातचीत हुई और कथित घोटाले में शामिल अन्य बैंक अधिकारियों, सरकारी कर्मचारियों व निजी व्यक्तियों की भूमिका क्या रही।
चैट और संदेश डिलीट करने पर भी सवाल
सीबीआई ने दोनों आरोपियों से यह भी पूछा कि यदि वे मामले में शामिल नहीं थे तो उन्होंने अपने मोबाइल फोन से संबंधित चैट, संदेश और अन्य डिजिटल रिकॉर्ड क्यों हटाए। एजेंसी का कहना है कि ये संदेश उनके पक्ष में साक्ष्य भी हो सकते थे।
जांच एजेंसी ने कथित तौर पर सह-आरोपियों को चेक सौंपने, उन चेकों के माध्यम से धनराशि के गबन, शेल कंपनियों में रकम ट्रांसफर करने और बाद में सरकारी खातों में धन लौटाने के कारणों को लेकर भी पूछताछ की।
सीबीआई का कहना है कि मामले की जांच अभी खुली हुई है और आने वाले दिनों में कई अन्य लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है।

