हरियाणा के प्रसिद्ध शक्तिपीठ में मां भगवती को चांदी से बनी विशेष पोशाक पहनाई गई। करीब 2.25 किलो चांदी से तैयार इस पोशाक पर गोल्ड प्लेटिंग की गई है। मंदिर में मां के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के बीच यह विशेष श्रृंगार आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
मान्यता है कि यहां गिरा था माता सती का टखना
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस शक्तिपीठ में माता सती के शरीर का टखना गिरा था। इसी मान्यता के चलते इस स्थान का विशेष धार्मिक महत्व है और श्रद्धालु दूर-दूर से मां के दर्शन करने पहुंचते हैं।
मां के इस विशेष श्रृंगार को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह है। चांदी से बनी पोशाक और उस पर की गई सुनहरी परत मंदिर की धार्मिक भव्यता को और बढ़ा रही है।
कुरुक्षेत्र में स्थित हरियाणा के एकमात्र शक्तिपीठ श्री देवीकूप मां भद्रकाली मंदिर में नवरात्रि के पहले दिन मां की प्रतिमा को 2.25 किलो चांदी से बनी गोल्ड प्लेटेड पोशाक पहनाई गई। मंदिर के पीठाध्यक्ष पंडित सतपाल शर्मा की पुत्रवधू निकुंज शर्मा का दावा है कि गुजरात के एक मंदिर में भगवान को ऐसी पोशाक पहने देखने और उसी रात सपने में मां भद्रकाली को भी इसी रूप में देखने के बाद इसे बनवाने का विचार आया।
निकुंज शर्मा ने परिवार की सहमति से यह पोशाक तैयार करवाई। गुजरात के तीन कारीगरों ने इसे 15 दिन में बनाया। पोशाक पर सोने जैसी चमक के साथ मां के आठ रूपों, श्याम रंग, त्रिशक्ति और भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं को ध्यान में रखकर डिजाइन बनाए गए हैं। परिवार ने रविवार को पहले नवरात्रि के अवसर पर ये ड्रेस मां को अर्पित की।
बता दें कि श्री देवीकूप मां भद्रकाली मंदिर 52 शक्तिपीठों में शामिल है और मान्यता है कि यहां माता सती का दायां टखना गिरा था।
कुरुक्षेत्र स्थित श्री देवीकूप मां भद्रकाली मंदिर को 52 शक्तिपीठों में शामिल माना जाता है। मंदिर से जुड़ी मान्यता के अनुसार, यहां माता सती का दायां टखना गिरा था। मंदिर परिसर में मां की प्रतिमा के सामने एक पवित्र कुआं है। माना जाता है कि यह वही स्थान है, जहां माता सती का टखना गिरा था। टखना गिरने के कारण यहां कुआं बनने की मान्यता है। मंदिर कमेटी ने सुरक्षा के लिहाज से इसे चारों ओर से कवर किया हुआ है। श्रद्धालु दूर से ही इसके दर्शन करते हैं।
मंदिर की मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण और बलराम का मुंडन संस्कार भी इसी स्थान पर हुआ था। महाभारत युद्ध से जुड़ी एक अन्य मान्यता के मुताबिक, पांडवों ने युद्ध में विजय की कामना से यहां हवन-यज्ञ किया था। उन्होंने जीत मिलने पर अपने युद्ध के घोड़े मां को अर्पित करने का संकल्प लिया था। युद्ध में विजय के बाद पांडवों ने यहां घोड़े अर्पित किए। इसी से मंदिर में घोड़े चढ़ाने की परंपरा जुड़ी मानी जाती है।
आज भी श्रद्धालु मंदिर में मन्नत का धागा बांधते हैं। मन्नत पूरी होने पर वे अपनी श्रद्धा के अनुसार मां के दरबार में चढ़ावा अर्पित करते हैं।

