कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान विष्णु चार महीने की योग निद्रा के बाद जागते हैं. इसलिए इस ​एकादशी को देवउठनी एकादशी कहते है। देवउठनी एकादशी इस बार 14 नवंबर रविवार सूर्योदय से 15 नवंबर सोमवार सुबह 06:40 तक है। कहते हैं कि इस दिन से शुभ व मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है। वैसे तो हर एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, लेकिन देवउनी एकादशी पर किए गए व्रत और पूजा से विष्णु जी प्रसन्न होते हैं और भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते है। देवउठी एकादशी के दिन को संध्या के समय कपूर आरती करने से आजीवन अकाल-मृत्यु से रक्षा होती है।

एकादशी के दिन पीले रंग के कपड़े, पीले फल व पीला अनाज विष्णु जी को अर्पित करें, इसके बाद ये सभी वस्तुएं गरीबों व जरूरतमंदों में दान कर दें. ऐसा करने से भगवान विष्णु की कृपा आप पर बनी रहेगी। इस दिन तुलसी के पास रंगोली बनाकर वहां दीपक जलाएं, इसके बाद तुलसी मंत्र या विष्णु भगवान के मंत्र का जाप करें, आप यदि ॐ नमो भगवते वासुदेवाय वासुदेवाय मंत्र का जाप भी 108 बार करते हैं तो आपको सभी कष्टों से मुक्ति मिलेगी

भीष्म पंचक व्रत :-

14 नवंबर रविवार सूर्योदय से 15 नवंबर सोमवार सुबह 06:40 तक है कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णमासी तक का व्रत ‘भीष्म-पंचक व्रत’ कहलाता है। जो इस व्रत का पालन करता है, उसके द्वारा सब प्रकार के शुभ कृत्यों का पालन हो जाता ह । यह महापुण्य-मय व्रत महापातकों का नाश करने वाला है। कार्तिक एकादशी के दिन बाणों की शय्या पर पड़े हुए भीष्मजी ने जल कि याचना कि थी तब अर्जुन ने संकल्प कर भूमि पर बाण मारा तो गंगाजी कि धार निकली और भीष्मजी के मुंह में आयी। उनकी प्यास मिटी और तन-मन-प्राण संतुष्ट हुए, इसलिए इस दिन को भगवान् श्री कृष्ण ने पर्व के रूप में घोषित करते हुए कहा कि ‘आज से लेकर पूर्णिमा तक जो अर्घ्यदान से भीष्मजी को तृप्त करेगा और इस भीष्मपंचक व्रत का पालन करेगा, उस पर मेरी सहज प्रसन्नता होगी ।’

देवउठनी एकादशी पर गायत्री मंत्र का जाप करने से स्वास्थ्य लाभ मिलता है, यदि धन प्राप्ति की इच्छा हो तो भगवान विष्णु को दूध में केसर मिलाकर उससे भगवान का स्नान करिए, इससे आपके घर में धन का आगमन स्वयं होने लगेगा है।

एकादशी को दिया जलाके विष्णु सहस्त्र नाम पढ़ें, विष्णु सहस्त्र नाम नहीं हो तो 10 माला “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप कर लें ।। अगर घर में झगडे होते हों, तो झगड़े शांत हों जायें ऐसा संकल्प करके विष्णु सहस्त्र नाम पढ़ें तो घर के झगड़े भी शांत होंगे ।

कौन यह व्रत करें :-

निःसंतान व्यक्ति पत्नीसहित इस प्रकार का व्रत करें तो उसे संतान कि प्राप्ति होती है ।।

जो अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं, वैकुण्ठ चाहते हैं या इस लोक में सुख चाहते हैं उन्हें यह व्रत करने कि सलाह दी गयी है ।।

एकादशी व्रत के पुण्य के समान और कोई पुण्य नहीं है ।। जो पुण्य सूर्यग्रहण में दान से होता है, उससे कई गुना अधिक पुण्य एकादशी के व्रत से होता है ।।

जो पुण्य गौ-दान सुवर्ण-दान, अश्वमेघ यज्ञ से होता है, उससे अधिक पुण्य एकादशी के व्रत से होता है ।।

एकादशी करनेवालों के पितर नीच योनि से मुक्त होते हैं और अपने परिवारवालों पर प्रसन्नता बरसाते हैं इसलिए यह व्रत करने वालों के घर में सुख-शांति बनी रहती है ।। धन-धान्य, पुत्रादि की वृद्धि होती है ।। कीर्ति बढ़ती है, श्रद्धा-भक्ति बढ़ती है, जिससे जीवन रसमय बनता है ।।

परमात्मा की प्रसन्नता प्राप्त होती है ।। पूर्वकाल में राजा नहुष, अंबरीष, राजा गाधी आदि जिन्होंने भी एकादशी का व्रत किया, उन्हें इस पृथ्वी का समस्त ऐश्वर्य प्राप्त हुआ ।। भगवान शिवजी ने नारद से कहा है : एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं, इसमे कोई संदेह नहीं है ।। एकादशी के दिन किये हुए व्रत, गौ-दान आदि का अनंत गुना पुण्य होता है ।।

एकादशी के दिन करने योग्य :-

एकादशी को दिया जलाके विष्णु सहस्त्र नाम पढ़ें, विष्णु सहस्त्र नाम नहीं हो तो 10 माला “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप कर लें ।। अगर घर में झगडे होते हों, तो झगड़े शांत हों जायें ऐसा संकल्प करके विष्णु सहस्त्र नाम पढ़ें तो घर के झगड़े भी शांत होंगे ।।

एकादशी के दिन ये सावधानी रहे :-

महीने में 15-15 दिन में एकादशी आती है एकादशी का व्रत पाप और रोगों को स्वाहा कर देता है लेकिन वृद्ध, बालक और बीमार व्यक्ति एकादशी न रख सके तभी भी उनको चावल का तो त्याग करना चाहिए एकादशी के दिन जो चावल खाता है तो धार्मिक ग्रन्थ से एक – एक चावल एक- एक कीड़ा खाने का पाप लगता है ।।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, एकादशी के दिन चावल खान से प्राणी रेंगने वाले जीव की योनि में जन्म पाता है। लेकिन द्वादशी को चावल खाने से इस योनि से मुक्ति मिलती है। पौराणिक कथा के अनुसार, माता शक्ति के क्रोध से बचने के लिए महर्षि मेधा ने शरीर त्याग कर दिया और उनका अंश पृथ्वी में समा गया। चावल और जौ के रूप में महर्षि मेधा उत्पन्न हुए, इसलिए चावल और जौ को जीव माना जाता है। जिस दिन महर्षि मेधा अंश पृथ्वी में समाया था, उस दिन एकादशी तिथि थी। इसलिए इस दिन चावल खाने से परहेज करना चाहिए।

वासुदेव ज्योतिष अनुसंधान केंद्र
पं अनुराग शास्त्री
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