करनाल के बलड़ी गांव के युवक राहुल का अमेरिका के वॉशिंगटन में ही हिंदू रीति रिवाज के अनुसार दाह संस्कार किया गया। बीती 29 मई को युवक की सड़क हादसे में मौत हो गई थी। युवक पार्सल डिलीवरी का काम करता था। मृतक की पहचान बलड़ी गांव के रहने वाले राहुल (23) के रूप में हुई है।
परिवार ने LED स्क्रीन पर दाह क्रम लाइव देखा। अंतिम संस्कार के वक्त मां, बाप, बहन व अन्य रिश्तेदारों का रो रोकर बुरा हाल था। हालांकि शव को भारत लाने की कवायद शुरू की गई थी लेकिन शव भारत नहीं लाया जा सका।
मृतक राहुल के पिता सुभाष ने 8 महीने पहले अपने इकलौते बेटे राहुल को 50 लाख खर्च करके अमेरिका भेजा था। करीब 2 महीने पहले ही उसे वॉशिंगटन में पार्सल डिलीवरी का काम मिला था। यहां वह पार्सल वाली गाड़ी चलाता था।29 मई (भारत में 30 मई) की रात 9 बजे राहुल रेड लाइट पर गाड़ी में था। उसी दौरान दूसरी तरफ से तेज रफ्तार कार आई और राहुल की गाड़ी को टक्कर मार दी। टक्कर इतनी जबरदस्त थी की राहुल की मौके पर ही मौत हो गई।
राहुल जब वॉशिंगटन में घर नहीं पहुंचा तो उसके रिश्ते में भाई लगने वाले रमन ने उसे कॉल की। नंबर बंद आने पर रमन ने अपने साथियों के साथ राहुल की तलाश शुरू कर दी। रेड लाइट पर उसकी गाड़ी क्षतिग्रस्त हालत में मिली। इसके बाद सभी युवक तुरंत पुलिस स्टेशन पहुंचे। यहां उन्हें पता चला कि सड़क हादसे में राहुल की मौत हो चुकी है।
इसके बाद बलड़ी गांव में परिवार को राहुल की मौत की जानकारी दी। राहुल के पिता ने सरकार से भी गुहार लगाई, लेकिन कोई मदद नहीं मिल पाई और परिवार की भी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह बेटे का शव अपने दम पर भारत लेकर आ सके। पिता सुभाष ने बताया कि राहुल का दाह संस्कार अमेरिका में ही करवाया गया है, अब अस्थियां मंगवाई जाएगी ताकि उनको यहां गंगा में प्रवाहित करवाया जा सके और आगामी क्रिया शुरू हो सके।
करीब सात महीने पहले अमेरिका में करनाल के नरूखेड़ी गांव के भारत नरवाल की भी मौत सड़क हादसे में हुई थी। भारत नरवाल का अंतिम संस्कार न्यू जर्सी सिटी में कर दिया गया। मृतक के ताऊ के बेटे राजेश ने भारत को मुखाग्नि दी थी। परिवार ने सरकार और प्रशासन से भारत का शव इंडिया लाने की गुहार लगाई थी, लेकिन यह नहीं हो सका।
वीडियो कॉलिंग के जरिए परिजनों ने अपने इकलौते बेटे के अंतिम दर्शन किए। करनाल के नरूखेड़ी गांव स्थित घर में 2 LED स्क्रीन लगाई गई थीं। एक स्क्रीन पुरुषों के लिए थी तो दूसरी महिलाओं के लिए थी। परिजनों ने बिलखते हुए अपने जिगर के टुकड़े को विदाई दी थी।
ऐसे में माता पिता अपने बेटो को अमेरिका या दूसरे देशों में डोंकी से भेज तो देते है लेकिन मृत्यु जैसे मामलों शव को भारत लेकर आना बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि नंबर एक तरीके से शव भारत लाने में जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, लेकिन दो नंबर या डोंकी वाले केसों में तो दाह संस्कार अमेरिका में ही करना पड़ता है।
