सावन के पावन महीने में जहां हजारों शिवभक्त कांवड़ लेकर अपने-अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं बीती रात यमुनानगर में एक ऐसी अनोखी कांवड़ देखने को मिली जिसने हर किसी को भावुक कर दिया। यमुनानगर के कलानौर नाके पर पहुंची इस कांवड़ में 102 वर्षीय बुजुर्ग महिला सुनहरी पालकी में विराजमान थीं।
उन्हें उनके पोते और दोहते ने श्रवण कुमार की तरह अपने कंधों पर बैठाकर हरिद्वार की तीर्थ यात्रा कराई और अब हर की पौड़ी से गंगाजल लेकर वापस पंजाब के पटियाला अपने घर की ओर जा रहे हैं, जिसकी दूरी करीब 300 कीलोमीटर है। इस दृश्य देख हर कोई दोनों युवकों की जमकर सराहना करता नजर आया।
102 वर्षीय सुनहरी ने भावुक होकर कहा कि उनकी उम्र के इस पड़ाव पर उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उनके पोते और दोहते उन्हें इस तरह पालकी में बैठाकर हरिद्वार दर्शन कराएंगे। उन्होंने कहा कि उन्हें अपने बच्चों पर गर्व है और भगवान हर परिवार को ऐसे संस्कारी और सेवा भाव रखने वाले बच्चे दें। उन्होंने कहा कि यह उनके जीवन के सबसे यादगार पलों में से एक है।
पोते सिमरन ने बताया कि वे पटियाला के रहने वाले हैं। उनके पिता की लंबे समय से इच्छा थी कि जिस प्रकार पौराणिक कथा में श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को पालकी में बैठाकर तीर्थ यात्रा कराई थी, उसी प्रकार वह अपनी मां यानी दादी सुनहरी को पालकी में बैठाकर हरिद्वार ले जाए। पिता की इसी इच्छा को पूरा करने का उन्होंने संकल्प लिया।
पिता की इस इच्छा के मुताबिक उन्होंने अपनी दादी को पालकी में बैठाकर हरिद्वार पहुंचाया, वहां हर की पौड़ी पर स्नान और दर्शन कराए तथा गंगाजल लेकर अब वापस पटियाला लौट रहे हैं। उन्होंने बताया कि हरिद्वार से पटियाला की दूरी करीब 300 किलोमीटर है और पूरी यात्रा पालकी को कंधों पर उठाकर की जा रही है।
इस सेवा यात्रा में सिमरन का साथ उनकी दादी के 17 वर्षीय दोहते विराट ने भी दिया। उसने बताया कि वह पंजाब के संगरूर का रहने वाला है। जब उसके मामा ने बताया कि नानी की इच्छा है कि उन्हें पालकी में बैठाकर हरिद्वार ले जाया जाए और परिवार भी यही चाहता है, तो उसने बिना देर किए यात्रा में शामिल होने का फैसला कर लिया। इस यात्रा में उसकी मां भी साथ आई हैं।
यात्रा के लिए विशेष रूप से मजबूत और आरामदायक पालकी तैयार कराई गई, ताकि 102 वर्षीय नानी को यात्रा के दौरान किसी प्रकार की परेशानी न हो। दोनों युवकों ने बताया कि पूरी यात्रा के दौरान जगह-जगह पर पालकी को रोका भी जाता है।
रास्ते में जहां भी लोग इस अनोखी कांवड़ को देखते, रुककर उनका हौसला बढ़ाते और दादी का आशीर्वाद लेते। कई स्थानों पर श्रद्धालुओं ने उनका स्वागत भी किया। यमुनानगर के कलानौर नाके पर भी यह अनोखी कांवड़ आकर्षण का केंद्र बनी रही।
