अहोई अष्टमी का व्रत 13 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र के लिए निर्जला उपवास रखती हैं। पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 05:53 से 07:08 बजे तक रहेगा। तारों को अर्घ्य देकर व्रत का पारण शाम 06:28 बजे से किया जा सकेगा। जानें इस महत्वपूर्ण व्रत का महत्व और पूजा विधि।
हिंदू धर्म में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का विशेष महत्व है। इसी दिन अहोई अष्टमी का व्रत रखा जाता है। माताएं इस दिन संतान की लंबी उम्र की कामना करती हैं। विवाहित महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को तारों के दर्शन कर उन्हें अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि अहोई अष्टमी व्रत करने से संतान को लंबी उम्र का आशीर्वाद प्राप्त होता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि अहोई अष्टमी 2025 कब है और क्या है इसका शुभ मुहूर्त।
इस साल अहोई अष्टमी का व्रत सोमवार, 13 अक्टूबर को पड़ रहा है। अष्टमी तिथि की शुरुआत 13 अक्टूबर 2025 को दोपहर 12 बजकर 24 मिनट पर हो रही है।, जबकि 14 अक्टूबर 2025 को सुबह 11 बजकर 09 मिनट पर अष्टमी तिथि समाप्त हो रही है।
अहोई अष्टमी के लिए पूजा का सर्वोत्तम समय शाम 05 बजकर 53 मिनट से लेकर 07 बजकर 08 मिनट तक रहेगा। कुल मिलाकर पूजा का शुभ मुहूर्त 1 घंटे 15 मिनट तक रहेगा। तारों का दर्शन कर व्रत के पारण का समय शाम को 06 बजकर 28 मिनट से शुरू हो जाएगा। वहीं, चंद्रोदय का समय रात 11 बजकर 40 मिनट है। कुछ स्थानों पर चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलने की परंपरा है।
अहोई अष्टमी का दिन दिवाली पूजा से लगभग आठ दिन पहले और करवा चौथ के चार दिन बाद आता है। करवा चौथ की ही तरह, अहोई अष्टमी का व्रत भी निर्जला रखा जाता है। करवा चौथ का व्रत पति की लम्बी आयु के लिए किया जाता है, तो अहोई अष्टमी संतान की लम्बी आयु के लिए रखा जाता है। उत्तर भारत में बड़े उत्साह के साथ इस व्रत को मनाया जाता है।
?जय माँ बगलामुखी जी?
?अहोई अष्टमी व्रत कथा?
अहोई अष्टमी व्रत कथा
अहोई अष्टमी का अर्थ “अनहोनी को होनी बनाना” होता है। इस बात को अहोई अष्टमी की इस कथा से समझा जा सकता है। पौराणिक कथा के अनुसार:-
?एक नगर में एक साहूकार रहा करता था, उसके सात बेटे थे, सात बहुएँ तथा एक पुत्री थी। दीपावली से पहले कार्तिक बदी अष्टमी को सातों बहुएँ अपनी इकलौती नंद के साथ जंगल में मिट्टी लेने गई। जहाँ से वे मिट्टी खोद रही थी। वही पर स्याऊ–सेहे की मांद थी। मिट्टी खोदते समय ननद के हाथ सेही का बच्चा मर गया।
स्याऊ(सेह) माता बोली– कि अब मैं तेरी कोख बाँधूगी।
तब ननंद अपनी सातों भाभियों से बोली कि तुम में से कोई मेरे बदले अपनी कोख़ बंधा लो सभी भाभियों ने अपनी कोख बंधवाने से इंकार कर दिया परंतु छोटी भाभी सोचने लगी, यदि मैं कोख न बँधाऊगी तो सासू जी नाराज होंगी। ऐसा विचार कर ननंद के बदले छोटी भाभी ने अपने को बंधा ली। उसके बाद जब उसे जो बच्चा होता वह सात दिन बाद मर जाता। एक दिन साहूकार की स्त्री ने पंडित जी को बुलाकर पूछा की, क्या बात है मेरी इस बहु की संतान सातवें दिन क्यों मर जाती है?
?तब पंडित जी ने बहू से कहा कि तुम काली गाय की पूजा किया करो। काली गाय स्याऊ माता की सखी है, वह तेरी कोख छोड़े तो तेरा बच्चा जियेगा।
इसके बाद से वह बहु प्रातःकाल उठ कर चुपचाप काली गाय के नीचे सफाई आदि कर जाती…
?एक दिन गौ माता बोली– कि आज कल कौन मेरी सेवा कर रहा है, सो आज देखूंगी। गौमाता खूब तड़के जागी तो क्या देखती है कि साहूकार की के बेटे की बहू उसके नीचे सफाई आदि कर रही है।
गौ माता उससे बोली कि तुझे किस चीज की इच्छा है जो तू मेरी इतनी सेवा कर रही है ?
मांग क्या चीज मांगती है..? तब साहूकार की बहू बोली की स्याऊ माता तुम्हारी सखी है और उन्होंने मेरी कोख बांध रखी है, उनसे मेरी कोख को खुलवा दो।
गौमाता ने कहा – अच्छा तब गौ माता सात समुद्र पार अपनी सखी के पास उसको लेकर चली। रास्ते में कड़ी धूप थी, इसलिए दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गई। थोड़ी देर में एक साँप आया और उसी पेड़ पर गरुड़ पंखनी के बच्चे थे, उनको मारने लगा। तब साहूकार की बहू ने सांप को मार कर ढाल के नीचे दबा दिया और बच्चों को बचा लिया। थोड़ी देर में गरुड़ पंखनी आई तो वहां खून पड़ा देखकर साहूकार की बहू को चोंच मारने लगी।
तब साहूकारनी बोली– कि, मैंने तेरे बच्चे को मारा नहीं है बल्कि साँप तेरे बच्चे को डसने आया था। मैंने तो तेरे बच्चों की रक्षा की है।
यह सुनकर गरुड़ पंखनी खुश होकर बोली की मांग, तू क्या मांगती है..?
वह बोली, सात समुद्र पार स्याऊमाता रहती है। मुझे तू उसके पास पहुंचा दें। तब गरुड़ पंखनी ने दोनों को अपनी पीठ पर बैठा कर स्याऊ माता के पास पहुंचा दिया।
स्याऊ माता उन्हें देखकर बोली की आ बहन बहुत दिनों बाद आई।
फिर स्याऊ कहने लगी कि बहन मेरे सिर में जूं पड़ गई है। तब सुरही गौ के कहने पर साहूकार की बहू ने सिलाई से उसकी जुएँ निकाल दी। इस पर स्याऊ माता प्रसन्न होकर बोली कि तेरे सात बेटे और सात बहुएँ हो।
साहुकारनी बोली– कि मेरा तो एक भी बेटा नहीं, सात कहाँ से होंगे ?
स्याऊ माता बोली– वचन दिया वचन से फिरूँ तो धोबी के कुंड पर कंकरी होऊँ।
तब साहूकार की बहू बोली माता बोली कि मेरी कोख तो तुम्हारे पास बन्द पड़ी हैं।
?यह सुनकर स्याऊ माता बोली तूने तो मुझे ठग लिया, मैं तेरी कोख खोलती तो नहीं परंतु अब खोलनी पड़ेगी। जा, तेरे घर में तेरे घर में तुझे सात बेटे और सात बहुएँ मिलेंगी। तू जा कर उजमान करना… सात अहोई बनाकर, सात कड़ाई करना… वह घर लौट कर आई तो देखा सात बेटे और सात बहुएँ बैठी हैं, वह खुश हो गई। उसने सात अहोई बनाई, सात उजमान किये, सात कड़ाई की… दिवाली के दिन जेठानियाँ आपस में कहने लगी कि जल्दी जल्दी पूजा कर लो, कहीं छोटी बहू बच्चों को याद करके रोने न लगे।
थोड़ी देर में उन्होंने अपने बच्चों से कहा – अपनी चाची के घर जाकर देख आओ कि वह अभी तक रोई क्यों नहीं..?
बच्चों ने देखा और वापस जाकर कहा कि चाची तो कुछ मांड रही है, खूब उजमान हो रहा है। यह सुनते ही जेठानीयाँ दौड़ी-दौड़ी उसके घर गई और जाकर पूछने लगी कि तुमने कोख कैसे छुड़ाई..?
वह बोली तुमने तो कोख बंधाई नहीं..! मैंने बंधा ली, अब स्याऊ माता ने कृपा करके मेरी को खोल दी हैं। स्याऊ माता ने जिस प्रकार उस साहूकार की बहू की कोख खोली, उसी प्रकार हमारी भी खोलियो, सबकी खोलियों… कहने वाले की तथा हुंकार भरने वाले तथा परिवार की कोख खोलिए।।
?इस तरह छोटी बहू को भी जीवभर मां बने रहने का सुख प्राप्त होता है। ऐसा कहा जाता है कि तभी से ही कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर स्याहु का चित्र बनाकर उसकी विधिवत पूजन करने की परंपरा है। मान्यता है कि अहोई माता, देवी पार्वती का ही एक स्वरूप है, जो संतानों की रक्षक देवी हैं। इसलिए महिलाएं अपनी संतान की दीर्घायु, सुख और समृद्धि के लिए अहोई माता को को प्रसन्न करती हैं।
?अहोई अष्टमी की पूजा विधि?
अहोई अष्टमी के दिन सुबह जल्दी स्नान आदि से निवृत होकर साफ पारंपरिक कपड़े करें।
अब घर की एक दीवार को अच्छे से साफ करें और इस पर गेरू या कुमकुम से अहोई माता की तस्वीर बनाएं। (आजकल बाजार से चित्र भी मिल जाता है वह भी लगा सकते है)फिर उनके समक्ष दीपक जलाएं और अहोई माता की कथा पढ़ें। इसके बाद देवी से बच्चों की रक्षा की प्रार्थना करें।
इसके बाद शाम के समय तारों का उदय होने के बाद विधिवत पूजन करें। अहोई माता को हलवा, पूरी, मिठाई आदि का भोग लगाएं।
फिर तारों को अर्घ्द दें,इसके बाद पूरे परिवार के साथ माता की आरती करें।
अंत में अहोई माता से प्रार्थना करें कि जैसे उन्होंने साहूकार की छोटी बहू की संतानों की रक्षा की, वैसे ही सभी बच्चों की रक्षा करें और उन्हें सुखी रखें।
पँ सुरेश वशिष्ठ
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