तीन कृषि कानूनों समेत अन्य मांगों को लेकर एक साल से दिल्ली के बॉर्डरों पर चल रहे किसान आंदोलन में संगठन अब अलग-अलग राह पर जा सकते हैं। पंजाब के ज्यादातर किसान संगठन अब इस आंदोलन को ज्यादा आगे खींचने के मूड में नहीं हैं। पंजाब की 32 जत्थेबंदियों ने आज 11 बजे सिंघु बॉर्डर पर अहम बैठक बुलाई है। इसमें वह आंदोलन को लेकर बड़ा फैसला ले सकते हैं। हालांकि उत्तर प्रदेश के किसान संगठन अभी आंदोलन चलाने के मूड में हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीन कृषि कानून वापस लेने की घोषणा के बाद अब क्या किया जाए, इस पर विचार-विमर्श करने के लिए संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक 27 नवंबर को सिंघु बॉर्डर पर हुई थी। इस बैठक में भी यही बात प्रमुख रूप से उठी कि यह इस आंदोलन की बड़ी जीत है। इसे जीत के रूप में स्वीकार करना चाहिए। जीत का जश्न मनाकर किसानों को अपने घर लौटना चाहिए। पंजाब-राजस्थान के संगठनों ने इसका समर्थन किया, लेकिन उप्र के कुछ संगठन इस बात से अलग दिखे। उनका कहना था कि अभी कई और मांगें (MSP पर गारंटी, 750 मृतक किसानों को मुआवजा, मुकदमे वापसी, मंत्री टेनी की गिरफ्तारी) बाकी हैं, उनके पूरा होने तक या फिर यूपी के विधानसभा चुनाव तक इस आंदोलन को चलाना चाहिए। हालांकि हरियाणा की जत्थेबंदियों ने कहा कि यदि सिर्फ MSP पर गारंटी कानून भी बन जाता है तो वे वापस चले जाएंगे।

किसान आंदोलन में करीब 70 किसान संगठन हैं, इसमें 40 संगठन अकेले पंजाब से हैं। टीकरी बॉर्डर पंजाब के किसानों के हवाले है, जबकि सिंघु बॉर्डर पर भी पंजाब के 50 फीसदी से ज्यादा किसान हैं। एक तरह से यह भी कहा जा सकता है कि इस आंदोलन में सबसे बड़ी हिस्सेदारी पंजाब की है। पंजाब की जत्थेबंदियां चाहती हैं कि आंदोलन खत्म हो और घर लौटा जाए। संयुक्त किसान मोर्चा की आम सहमति इस पर नहीं है। इसलिए पंजाब की जत्थेबंदियों का दूसरा सुझाव यह है कि आंदोलन अब दिल्ली के चार बॉर्डरों की बजाय एक बॉर्डर पर चलाया जाए और सारे संगठन एक जगह ही मौजूद रहकर प्रदर्शन करें। राजस्थान के किसान नेता हिम्मत सिंह गुर्जर ने भी पंजाब की जत्थेबंदियों की इस बात का समर्थन करते हुए एसकेएम को सुझाव दिया है। गाजीपुर बॉर्डर इसके लिए उपयुक्त बताया गया है।

भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) के गुरनाम सिंह चढूनी पहले ही पंजाब चुनाव में प्रत्याशी उतारने का ऐलान कर चुके हैं। इससे भी पंजाब के किसान संगठन उनसे खफा हैं। चढूनी के पुराने साथी उनसे पहले ही अलग हो चुके हैं। भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत भी आंदोलन को विस चुनाव तक खींचने के मूड में हैं। योगेंद्र यादव पर लगातार आरोप लगते रहे हैं कि वे अराजनैतिक नहीं हैं। कुल मिलाकर जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे किसान नेताओं के सुर बदलते दिखाई पड़ रहे हैं। एक दिन पहले महाराष्ट्र में राकेश टिकैत ने धमकी भरे अंदाज में कहा है कि सरकार अपने दिमाग ठीक कर ले। 26 जनवरी फिर से आ रही है। 4 लाख ट्रैक्टर और किसान भी यहीं पर मौजूद हैं। दरअसल, टिकैत की मंशा है कि चुनाव तक सरकार पूरी तरह घिर जाएगी और हमारी एक-एक बात मानेगी। बाकी राज्यों के किसान संगठन तीन कानून वापसी को गोल्ड अपॉरचुनिटी मानते हुए इसे खोना नहीं चाहते।

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